धर्म आध्यात्मिकता से कोसों दूर हो चला हैं

Author: Himanshu Ranjan

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अभी मैं जो लिख रहा हूँ वह बात शायद आपको पता होगी| कभी-कभी सत्य को या विचार को जो स्वाभाविक सा लगता है व्यक्त करना ज़रूरी होता हैं, अन्यथा झूठ और अवैज्ञानिक बातें ही सत्य प्रतीत होने लगती हैं |

श्री राम को मैं बचपन से रामायण की कहानी के द्वारा जाना, मंदिरों मे उनकी छवि देखकर एक छवि बनाई और मुख्यतः श्री राम और श्री हनुमान (भक्त और भगवान) के अनूठे संबंध को रोचक सा पाया | धीरे-धीरे जब बड़ा हुआ तो इतना तो समझ आ ही गया की आध्यात्मिक मार्ग पर चलना कठिन हैं| यह कठिनाई ही शायद आध्यात्मिकता और धर्म के बीच का फासला सी बन गई हैं |

श्री राम को विष्णु जी का अवतार कहा जाता हैं, और विष्णु जी को अधिकतर हिंदू मान्यताओं मे स्वयंभू कहा जाता हैं | यानी वह स्वयं भगवान हैं – सृष्टि के रचयिता हैं और जो भी विशेषण भगवान को शोभित होते हैं वह उनके नाम बन जानते हैं| जैसे उन्हें श्री जगन्नाथ भी बुलाते हैं | जिन विशेषणों से हम उन्हें सुशोभित करते हैं उनमें से कुछ मुस्लिम संप्रदाय अल्लाह को सुशोभित करते हैं | तो तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से श्री राम और अल्लाह एक ही हुए | कुछ मतभेदों को अभी नहीं लाते हैं क्यूंकी मुस्लिमों के अनुसार अल्लाह अजन्मा हैं | हिंदू से पूछेंगे तो वो कहेगा श्री राम भी स्वयंभू हैं, अजन्मा हैं और उन्हें भगवान ही मानेगा | भक्ति योग मे ईष्ट ही भगवान हैं | हिंदू दर्शन मे नित्य और लीला हैं, द्वैत और अद्वैत हैं, एकोहम बहुस्याम हैं और दर्शन पढ़ने के बाद यह निष्कर्ष तो आता हैं की श्री राम और अल्लाह एक ही हैं |

यानी मंदिर मस्ज़िद मे प्रार्थना एक ही ईश्वर को अलग-अलग तरीक़े से की जाती हैं | अगर आप विपश्यना करें तो समझ जाएँगे की ऊपर का छिलका ही अलग हैं| वेश-भूषा, ख़ान-पान, मंदिर-मस्ज़िद सब छिलके हैं | धर्म इसी छिलके में फँसा हुआ प्रतीत होता हैं जबकि आध्यात्मिकता इन छिल्को से थोड़ा भीतर हैं और इसलिए कठिन भी हैं | क्यूंकी आध्यात्मिकता दिखावा नहीं हैं | आध्यात्मिकता कठिन हैं और आम इंसान छिल्के के भीतर जाने की कोशिश नहीं करता| आध्यात्मिकता सभी छिल्के उतार फेंकती हैं| सारे अंतर समाप्त कर देती हैं | यहाँ तक की अहम की अनुभूति भी |

आज जो फ़ैसला आया उससे आध्यात्मिकता का कोई लेना देना नहीं हैं | उससे राजनीति का, धर्म का और उन सब चीज़ों का लेना-देना हैं जो छिल्को पर ध्यान देती हैं | इसमें न्यायपालिका का कोई दोष नहीं क्यूंकी विवाद छिलके पर ही थी | पर दुख इस बात का हैं की हम छिलकों से चिपके रहते हैं | इसके लिए आध्यात्मिकता से कोसों दूर चले आते हैं| आए भी क्यूँ न क्यूंकी आध्यात्मिकता कठिन हैं | छिलके के नाम पर दंगे होते हैं, बहुमूल्य मानव जीवन की आध्यात्मिकता के तट से कोसों दूर हत्या हो जाती हैं और हम फिर भी उन्ही छिलकों मे लिपटे रहते हैं | इसका एक ही कारण हैं आध्यात्मिक होना काफ़ी कठिन हैं | मैं भी आध्यात्मिक नहीं हूँ|

पर इतना मैं ज़रूर चाहता हूँ की लोग छिलकों से दूर एक बार ही सही इस सत्य को स्वीकार कर ले | श्री राम के समीप कोई मंदिर हमें नही ले जा सकता क्यूंकी यह कार्य इतना आसान नहीं हैं | भीतर का मंदिर प्रतिदिन टूटता रहता हैं – वह खंडहर सा हो गया हैं और अगर कोई मेरा सीना श्री हनुमान की तरह चीरकर देखें तो यकीनन वहाँ श्री राम नहीं मिलेंगे| क्यूंकी आध्यात्मिकता कठिन हैं | वह वैज्ञानिकता पर आधारित हैं दिखावे पर नहीं | वह असतो मा सदगमयं की यात्रा हैं और अगर मैं इतिहास के पन्ने पलटता हूँ तो मुझे वह यात्रा अधोगामी ही दिखाई देती हैं | और जब स्वयं के भीतर झाँकता हूँ तो अंधकार ही दिखाई देता हैं| क्यूंकी आध्यात्मिकता कठिन हैं |

मैं चाहता हूँ की हिंदू मुस्लिम, जात-पात के छिल्को को उतार कर हम आध्यात्मिक, वैज्ञानिक दृष्टि से आत्म-निर्माण, राष्ट्र-निर्माण और विश्व-निर्माण करें | इसकी सबसे पहली कड़ी आत्म-निर्माण ही हैं जो की कठिन हैं और जहाँ दिखावे और छिल्को के लिए कोई जगह नहीं हैं | पर्यावरण, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, शांति एवं सदभाव, संवेदना, और वैज्ञानिक सोच के साथ ही कठिन सी लगने वाली आध्यमिकता जुड़ी हैं | हमारे कर्मों, विचारों और अहम भाव से आध्यात्मिकता प्रभावित होती हैं और जिस प्रकार से मैं देख पा रहा हूँ श्री राम (अल्लाह) से मैं और मेरा धर्म कोसों दूर हो चला हैं | मंदिर-मस्ज़िद के इस तरह निर्माण से मैं एक इंच भी ईश्वर के निकट नहीं गया हूँ| शायद दूरी और बढ़ सी गई हैं |

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