इस अंधरे में एक दीप जलाओ!

Author: Himanshu Ranjan

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मेरे मुल्क की गीली मिट्टी पर
मेरे  क़दमों के निशां हैं,
तुम उनकी गिनती कर लो।
मैं भूखा हिंदुस्तान हूँ,
फिर भी आज़ाद हूँ।
दानों के इंतज़ार में पंछियों के लिए
तुम पिंजड़े लेकर आ गए!
मैं नंगा हिंदुस्तान हूँ,
मेरे कपड़ों से मेरी पहचान कर लो!
इन चमड़ों के भीतर बहती हैं एक नदी
जो उबल पड़ी हैं, इनकी छींटें
तुम्हारे कानून पर पड़ चुकी हैं।
अब जो भी होगा थोपा जाएगा।
विवेकानंद की स्मृति मिटाएगा।
 
भारत माँ! मुझे स्वीकार कर लो
मेरा मज़हब तो मत देखो।
माँ! मैं तुम्हारे शरण में हूँ!
मुझे गोद में ले लो!
तुम्हारी आँखों में मुझे प्रेम दिखता हैं
और आस-पास नफरत!
तुम यूं ही मुझे देखती रहो माँ!
मुझे आँखों से ओझल मत होने दो।
कौन हैं गद्दार? किसको मारी जाएगी गोली?
ऐसे नारों से मेरा विचलित मन
तुम्हारे पास आया हैं!
मैं भूखा ही सो जाऊंगा
बस मुझे लोरी सुना दो,
संविधान वाली,
मैं चैन से सोना चाहता हूँ। 

ये जो एक तरफ़ा प्रकाश हैं
वहां आँखें इतनी चौंधियां सी गईं हैं,
की अँधेरा दिखाई नहीं देता।
इस अँधेरे में बहुत कुछ नाज़ायज़ होता हैं।
कई ज़ुल्म होते हैं,
कुछ धर्म के नाम पर, कुछ जात के नाम पर।
कुछ ग़रीबी और बेरोज़गारी के नाम पर!
फिर भी हम सपने पालते हैं,
धीरे-धीरे अँधेरा दूर होगा! 
माँ! तुम्हारे लिए ही सपने देखते हैं!
पर अब जो ये अँधेरा हैं,
ये तुम्हारे नाम पर ही हैं!
तो बताओ की हम किसके सपने देखें?
इस अंधरे में एक दीप जलाओ माँ!

“न्यायाधीश! इस अंधरे में एक दीप जलाओ!”

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