मेरी और तुम्हारी पहचान के बीच की खाई

Author: Himanshu Ranjan

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एक शिशु जब जन्म लेता है तो उसके साथ ही कुछ पहचान जोड़ लेता है | जैसे की उसका जन्म जिस देश में हुआ वो उसका नागरिक कहलाता है | जो भाषा उसके परिवार में बोली जाती है, उसे सीखकर ही वो बड़ा होता है | वही उसकी मातृ भाषा बन जाती है | देश के जिस राज्य या क्षेत्र में वो जन्म लेता है, उससे भी जुड़ाव महसूस करता है | उसकी धर्म, जाति भी वो एक तरह से अपने माता-पिता से ही वरण करता है | उसका लिंग भी लगभग जन्म के समय तय हो जाता है की वो लड़का है या लड़की | तथा साथ ही उसके जीनोम में 0.6 प्रतिशत की एक अनूठी भिन्नता होती है – जो मुख्यतः अनुवांशिक होती है | यह जीनोम कुछ हद तक उस शिशु की शारीरिक रूप का कारक होता है | जैसे की वो गोरा दिखेगा अथवा काला…वगैरह वगैरह |

यानी की पहचान का एक बड़ा हिस्सा जन्म के साथ ही तय हो जाता है | और यह उस शिशु के वश में नहीं है | यानि की पहचान में भिन्नता स्वाभाविक एवं नैसर्गिक बात है | किन्तु यह स्वाभाविक एवं नैसर्गिक सी लगने वाली भिन्नता आपस में टकराव पैदा करती है | टकराव की वजह ये है की हम तुलना करने लगते है | स्वयं को वरिष्ठ साबित करने की कोशिश करते है | क्या यह तुलना, यह टकराव, डार्विन के सिद्धांत की वजह से है ? क्या यह इस वजह से है की संसाधन सीमित है ? क्या यह एक सामाजिक मानक अथवा नॉर्म जैसा है ? जो भी है – इन भिन्नताओं के बीच की खाई या टकराव को हमें समझना होगा, पढ़ना होगा |

दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में रंगभेद का इतिहास रहा है | यानि की एक मनुष्य अपने आप को वरिष्ठ साबित करता है, क्यूंकि वह गोरा है – और फिर काले रंग की चमड़ी होने के कारण दूसरे मनुष्य को प्रताड़ित करता है | अफ्रीका के लोगों को दास बनाकर दक्षिण और उत्तरी अमेरिका भेजा जाने लगा | यानि की हम बंदरों सरीखा या उससे भी बदतर व्यवहार करते है | हमारे भीतर एक पशु प्रवृत्ति है क्यूंकि हम उन्हीं से विकसित हुए है | अब चमड़ी का रंग बदलना तो व्यावहारिक नहीं है, हमें अपनी सोच ही बदलनी होगी | सोच में बदलाव ही हमें पशु से इंसान बनाती है |

भारत में धर्मों के बीच के टकराव का इतिहास रहा है | आश्चर्य तो ये है की इनमें से अधिकतर ने धर्म के दर्शन को पढ़कर स्वीकार नहीं किया, बल्कि यह धर्म उन्हें विरासत में मिला | हिन्दू धर्म वाले कहते हैं मुसलमानों ने हमें प्रताड़ित किया, इसलिए अब हम भी प्रताड़ित करेंगे |मस्जिद-मंदिर तोड़े जाते है, दंगे होते है, एक दुसरे को मारते-काटते है | धर्म के नाम पर विभाजन कर दिया जाता है | धर्म के नाम पर राष्ट्र खड़े कर दिए जाते है | अब एक ही धर्म विश्व भर में हो जाए तो कैसा लगेगा ? जंगल में एक ही पौधा फैल जाए तो कैसा लगेगा ? ऐसे पौधों को आक्रामक उपजाति (इनवेजिव स्पीशीज) कहा जाता है | ध्यान देने वाली बात ये है की ऐसा क्यों हो रहा है ? इसका सीधा कारण हैं हमने अपना विवेक त्यागकर किताबों में जो भी अंट शंट लिखा है उसे ही पत्थर की लकीर मान लिया है | दूसरी की हम खान-पान, रीति-रिवाज़ आदि परम्पराओं में भी तुलना करने बैठ जाते है | हमारा ही धर्म श्रेष्ठ है, हमारे ही तौर तरीके सही है, हमारा ही एकमात्र मार्ग है, और अगर उसमें कोई त्रुटि निकाले तो हम बौखला उठते है | विवेक त्याग देते है | पुनः पशु बन जाते है | यानी धर्म एक ऐसी चीज़ है जो गलत हो ही नहीं सकती – क्यूंकि उसके साथ एक पवित्रता का, एक दिव्यता का भाव जोड़ दिया जाता है | इसलिए सबसे अधिक धर्म के द्वारा ही ठगे जाते है |

दूसरी की धर्म का राजनीतिकरण किया गया | मनुष्य चूँकि पशुओं से ही विकसित हुए है, अतः इनको सँभालने के लिए कोई शासक चाहिए, कोई नियम-कानून चाहिए | इसी तलाश में आधुनिक राज्य प्रणाली बनीं | कुछ में लोकतंत्र यानि की लोगों के मत से शासक को चुना जाने लगा | लोगों का मत उनकी पहचान से प्रभवित होता ही है | इस तरह धार्मिक ध्रुवीकरण होने लगा | दूसरा की यह मेरी राज्य सीमा है उसे दर्शाने के लिए मेरे पहचान चिह्न हो | जैसे जंगल में बाघ पेड़ों को खरोचकर या उन पर मूत्र विसर्जित कर अपनी सीमा पर हक़ जताते है | उसी तरह पुराने ज़माने में शासक अपने धार्मिक चिह्नों को बनाकर और दूसरों के धार्मिक चिह्नों को ध्वस्त कर, एक तरह से उस सीमा अथवा क्षेत्र पर अपना हक़ जताने लगे | यानि की एकदम पशुओं जैसा ही व्यवहार था |

यानि की धर्म के दर्शन में भले ही शांति एवं प्रेम के उपदेश हो, किन्तु अंततः उनका राजनीतिक औजार के रूप में शासन करने हेतु दोहन किया जाने लगा | यानि की मनुष्य के अंदर का जो पशु है, वो शासन करना चाहता है, वो स्वयं को वरिष्ठ साबित करना चाहता है, वह दूसरों को प्रताड़ित करना चाहता है | इसी पशुता के पहचान को अन्य पहचान की परतों के नीचे ढका जाने लगा | फिर उन्हें पवित्र कहा जाने लगा |

भारत में कई जातियां है | चतुर्वर्ण में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र है | ऐसे तो कहा गया की वर्णों का विभाजन गुणों के झुकाव पर आधारित है | किन्तु असल में हज़ारों जातियों में भारतीय जनता बँटी हुई है | इसमें भी ध्येय यही था की किस तरह स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर, दूसरों को प्रताड़ित किया जाए, उन पर शासन किया जाए | अनुवांशिक आधार पर भी श्रेष्ठता स्थापित करने की कोशिश हुई | यानि ऐसी सोच थी की मजबूत और मज़बूत बनें एवं कमज़ोर और कमज़ोर | हांलांकि यह सोच वैज्ञानिक आधार पर गलत साबित हुई |

आखिर हमें जातियों की ज़रुरत पड़ी ही क्यूँ ? इसके दो ही कारक ध्यान में आते है | एक तो यह की कार्यों के विभाजन से समाज सुचारू रूप से चल सकें – जैसे सभी शिक्षक ही न बन जाए, या सैनिक ही न बन जाए, या बढ़ई ही न बन जाए | सभी कार्यों को करने के लिए कोई न कोई पहले से ही हो | किन्तु असल में यह पशुओं से विकसित मनुष्य जाति में श्रेष्ठता साबित करने की होड़ ही थी | प्रताड़ित करने का माध्यम था | मैला कौन साफ़ करें ? किसे अछूत बना दिया जाए ? किसे आदर मिले ? यह उस साजिश का ही परिणाम था | और आज भी हम इस जाति व्यवस्था में बुरी तरह से फंसे हुए है | मुस्लिम धर्म में भी सिया, सुन्नी, अहमदिया और न जाने ऐसे कितने विभाजन है – जो पशु मानसिकता की तरफ ही इशारा करते है |

स्त्री और पुरुष में भिन्नताएँ प्रकृति की देन है | किन्तु यह पशु मानसिकता ही थी जिसके द्वारा स्त्रियों पर अत्याचार किया गया | एक तरह से पुरुष को स्त्री का शासक बनाया गया | क्यूंकि पुरुष शारीरिक रूप से मज़बूत थे | अतः उन्होंने ऐसा किया | पहले इतनी मानसिक रूप से कार्य करने के साधन न थे | शारीरिक कार्य ही प्रमुख थे | कभी धर्म का आड़ लेकर भी उन्हें पुरुषों के अधीन किया गया | स्त्रियों के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध यौन सम्बन्ध बनाए गए | उन्हें दासी बनाया गया | स्त्रियों पर अत्याचार कर एक तबका दुसरे तबके पर शासन दिखाता था | सती प्रथा, बाल विवाह, पुश्तैनी संपत्ति में उन्हें हक़ न देना, दहेज़ व्यवस्था, ट्रिपल तलाक़, न जाने ऐसी कई कुरीतियां थी और हैं | यहाँ तक की कई देशों में उन्हें मतदान करने के अधिकार भी पुरुषों से दशकों बाद मिलीं | यानि की पहचान में प्राकृतिक भिन्नता को मनुष्यों ने एक दुसरे पर शासन करने का, एक दुसरे को प्रताड़ित करने का जरिया बनाया |

दूसरी की स्त्रियां भी इन भिन्नताओं को देखकर श्रेष्ठ को चुनती है | यानि की जीवन साथी के चुनाव को लेकर भी एक प्रकार की स्पर्धा होती है | यह एक पशु प्रवृत्ति कह सकते है | जैसे युद्ध में राज्य जीते जाते थे, वैसे ही स्त्रियां जीत ली जाती थीं | ट्रांसजेंडर्स को लेकर पहले के मुताबिक जागरूकता बढ़ रही है | अन्यथा जो अपने को स्त्री और पुरुष जैसे वर्गों में नहीं रख पाते थे – उनको तिरस्कृत एवं प्रताड़ित ही किया जाता रहा है | ऐसा अभी भी है | साथ ही स्त्री-पुरुष के बीच के आकर्षण के अलावा अन्य कोई भी आकर्षण हो तो वह भी प्रताड़ित करने का एक जरिया ही बन गई |

भारत देश में राज्यों के गठन के वक़्त भाषा आधार बनी | हांलांकि शुरुआत में सरकार ऐसा नहीं चाहती थी | किन्तु विरोध हुआ, आंध्र प्रदेश तेलुगु भाषी, तो कर्णाटक में कन्नड़ भाषी, केरल में मलयालम भाषी…इस तरह राज्यों का गठन एवं विभाजन होता रहा | मातृ भाषा से जुड़ाव, भाषीय पहचान की महत्ता इसी से हो चली | लोगों ने लड़कर कहा की हम एक भाषा बोलने वाले अपनी एक गुट बनाएँगे | बिहारी-मराठी में जो द्वन्द था वो यही था की मराठी श्रेष्ठ है | यानि जब भी आप लोगों को किसी समूह में बांटने को कहें तो अक्सर वह एक जैसी पहचान वालों के साथ सहज हो पाएंगे | प्रयोग कर के देख लें | जो ऐसा नहीं करेंगे वो अलग-थलग पड़ जाएंगे |

पहचान के और भी कई परतें होतीं है, पर अभी के लिए इतना काफी है | भारत देश स्वतन्त्र तो हुआ किन्तु अंग्रेज़ों ने कई कुटिल चालें चलीं ताकि पहचान में इन भिन्नताओं के इस्तेमाल से वो खुद का शासन बनाए रख सकें | फूट डालो और राज करो उनकी नीतियों में से एक थी | क्यूंकि उन्हें पता था की फूट डालना आसान है |

प्रकृति में भिन्नता उसे खूबसूरत बनाती है | गुलाब का फूल अच्छा है तो कैक्टस के पेड़ का भी अपना महत्त्व है | उसी तरह पहचान में भिन्नता भले वो रंग, रूप, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, राष्ट्र, भाषा इत्यादि से जुडी हो, वह मानव सभ्यता को खूबसूरत ही बनाती है | पहचान तो अधिकांशतः विरासत में मिली हुई होती है अथवा प्राकृतिक होती है | इसमें हमारा चुनाव कम ही हो पाता है | हमें अपने पहचान को समझने की ज़रुरत है, उसे श्रेष्ठ साबित करने की नहीं | हमें अधिक सहिष्णु बनना पड़ेगा | हमें कई पहचान को अपनाना होगा | मातृभाषा के अलावा भी अन्य भाषाओँ को सीखें |अपने गृह राज्य से बाहर निकलकर, दुसरे राज्यों में भी रहें…वगैरह वगैरह | हमें दूसरों को गले लगाने से पहले उनकी उन पहचान से उन्हें नहीं आंकना चाहिए जिन पर उनका हमारा कोई वश ही नहीं | हमारा वश है तो इस बात पर की हम अपनी पशु प्रवृत्ति को समझे | किस प्रकार हमने विवेकहीन रूप से अपनी श्रेष्ठता दूसरों पर थोपनी चाही | किस प्रकार हमने जब भी मौका मिला तो प्रताड़ित करने में कोई कमी न छोड़ीं | किस प्रकार हमने पहचान में भिन्नताओं को दुसरे पर शासन करने के, प्रताड़ित करने के लिए इस्तेमाल किया | जबकि हमारी यह पहचान हम सभी को विरासत में अथवा प्राकृतिक रूप से ही मिलीं | इसे हमें भली-भांति समझना होगा | हमें अपने पूर्वाग्रहों को समझना होगा | ऐसा करने से हम पशु से मनुष्य की यात्रा तय कर पाएंगे | इसमें समय लगेगा क्यूंकि अक्सर पूर्व में किए गए क्रियाओं की गूँज प्रतिक्रिया बनकर चक्रवत चलती ही रहती है |

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