वित्त मंत्री ‘बजट में’ एक हज़ार करोड़ रूपए ‘इसके लिए’ क्यूँ रखे?

लेखक - हिमांशु रंजन

0
640

1 फरवरी 2022 को ‘श्री निर्मला सीतारामन्’ बजट पेश करने वाली हैं | कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च करना ही बुद्धिमानी है | 

अतः सर्वप्रथम तो हमें अपनी प्राथमिकताओं को तय करना चाहिए | 

प्राथमिकता तय करने के लिए हमें वैज्ञानिक प्रक्रिया को अपनाना होगा | इसमें स्पष्ट लक्ष्य और उन्हें प्राप्त करने की सटीक विधि पर ध्यान देना होगा | 

स्पष्ट लक्ष्य: भारतीय अर्थव्यवस्था अगले पांच वर्षों तक निरंतर आठ से दस प्रतिशत की विकास दर से बढ़ें | वास्तविक विकास दर (महंगाई को ध्यान में रखकर) पांच से सात प्रतिशत की अगले पांच वर्षों तक निरंतर रहें | 

आप कह सकते है की लक्ष्य तो ऊंची रखनी चाहिए, किन्तु मध्यम से उच्च विकास दर अगर निरंतर बनी रहें तो वह एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था की सूचक है | चक्रीय विकास दर (कभी उच्च विकास दर तो कभी निम्न विकास दर) एक अस्वस्थ अर्थव्यवस्था का सूचक है | आप कह सकते है की इस पर हमारा नियंत्रण नहीं – क्योंकि अनिश्चितता बनी रहती है – कभी व्यापार युद्ध तो कभी कोरोना जैसी महामारी आ जाती है | किन्तु फिर भी कुछ प्रभावकारी कारकों पर ध्यान दें तो एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है | अर्थव्यवस्था में एक लचीलापन (रेज़ीलियन्स ) लाई जा सकती है | 

अतः हमारे ‘स्पष्ट लक्ष्य’ में ‘निरंतरता’ और ‘स्वस्थ अर्थव्यवस्था’ जैसे विचार प्रमुख है | इसे प्राप्त करने की सटीक विधि तक पहुँचने के लिए हमें कुछ तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए – 

अगर आप रेल से भारत की यात्रा करेंगे तो इससे ही हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है | आपको हरे-भरे खेत, जंगल, नदियाँ, पठार ही मुख्यतः दिखाई देंगे | यानी कृषि हमारे देश की नींव है | कृषि को बजट में उचित स्थान भी मिलता है | यह भी सत्य है की देश की पैंतालीस प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है | 

दूसरी की देश में कुछ शहर ऐसे है जो भारत की सकल घरेलु उत्पाद का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है | उदाहरणस्वरूप केवल मुंबई शहर ही भारत की सकल घरेलु उत्पाद में  6 प्रतिशत का योगदान देता है | दिल्ली 4.4 प्रतिशत, बेंगलुरु लगभग 4 प्रतिशत इत्यादि | अगर हम विश्व की सबसे तेजी से विकास करने वाले शहरों को देखें तो उनमें भारतीय शहर जैसे सूरत, आगरा, बेंगलुरु, हैदराबाद, नागपुर आदि शामिल है | 

तो यह प्रतीत होता है की ये उभरते हुए शहर ही भारत के विकास की इंजन है | सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) जिसकी भारत की जी. डी.पी. में  54 प्रतिशत हिस्सेदारी है, रोजगार में 32 प्रतिशत का योगदान देता है, एवं मुख्यतः इन्हीं शहरों में केंद्रित है | 

अतैव शहरों की तरफ पलायन हो रहा है | असमानता भी बढ़ रही है | ‘के शेप’ रिकवरी एक सच्चाई है जिसने इस असमानता को और बढ़ाया है | 

तीसरी बात है की हम निर्यात एवं आयात की ओर ध्यान दें | अन्य देशों की अर्थव्यवस्था से हमें प्रतिस्पर्धा करनी होगी | ‘इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर्स’ चीन के आयात का 27 प्रतिशत है | चीन ऐसे कच्चे मालों को आयात कर, उनमें मूल्य संवर्धन कर,  महंगे दामों में विकसित देशों को निर्यात करता है | जबकि हमारे निर्यात में – मोती, कीमती रत्न, रिफाइनरी इत्यादि प्रमुख है | हमें विश्व पटल की जरूरतों को समझना होगा | विश्व के देश क्या, किससे और क्यों आयात करते है, इसे समझना होगा | हमारे पास एक विशाल श्रम बल है जिसका उपयोग हमें करना होगा | 

तो इसका अर्थ यह हुआ की हमारे विशाल श्रम बल को रोजगार शहरों में मिलता है किन्तु वह पर्याप्त नहीं है – क्यूंकि सेवा क्षेत्र की जी. डी.पी. में  54 प्रतिशत हिस्सेदारी है, किन्तु रोजगार में 32 प्रतिशत का ही योगदान है | ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, मत्स्य पालन, गौपालन की रोज़गार में हिस्सेदारी 42 फीसदी है किन्तु उनका जी. डी.पी. में 18 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी है | विनिर्माण क्षेत्र की जी. डी.पी. में  30 प्रतिशत हिस्सेदारी है, एवं रोजगार में 26 प्रतिशत का योगदान है | यह तो हुई रोजगार में हिस्सेदारी की बात | इसके अलावा कई बेरोजगार है, कई को ठेके पर मज़दूरी मिलती है, कई दुसरे के खेतों में मज़दूरी का कार्य करते है | साथ ही महिलाओं की भागीदारी हमारे श्रम बल में बहुत कम है – यानी मात्र 23 प्रतिशत ही हैं | 

एक तरह से यह भारतीय समाज का आईना ही है | हम कृषि पर निर्भर है, सेवा क्षेत्र में जाना चाहते है, एवं महिलाओं को पारंपरिक बंधनों में ही बंधा देखना चाहते है | यानी हमारी सोच में बदलाव की ज़रुरत है जो सही शिक्षा से ही हो सकती है | 

अतः देश का मानव संसाधन विकसित करना और उसे उपयुक्त अवसर देना एक चुनौती है | असमानता के आधार पर मानव विकास सूचकांक (आई एच डी आई) में हमारी स्तिथि निम्न है | यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति आय में हम कहीं चूक रहे है | प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी तो घरेलू खपत भी बढ़ेगी जो हमारी जी डी पी का लगभग 60 प्रतिशत है | 

साथ ही उद्यमिता को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है | रोजगार सृजन में ‘स्टार्टअप’ और सूक्ष्म, लघु, एवं मध्यम उद्योगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है | इनको सही वक़्त पर उचित सहयोग प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है |  

कुछ उभरते हुए क्षेत्रों में हम वैश्विक बाज़ार पर अधिक पकड़ बनाए – इसके लिए नवाचार और शोध को बढ़ावा देना भी अत्यधिक आवश्यक है | सरकार को एक प्रोत्साहित करने वाली संस्कृति बनानी होगी | ‘उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन’ एक अच्छा कदम है |

अतः इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमारी प्राथमिकताएं निम्न होनी चाहिए – 

1 ) मानव संसाधन के विकास हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं हुनर के क्षेत्र में खर्च को बढ़ाना 

2 ) हमारे विशाल श्रम बल को रोजगार प्राप्त हो इसके लिए उन्हें अवसर एवं हुनर प्रदान करना 

3 ) अवसर एवं हुनर के लिए निर्यात पर विशेष ध्यान देना | निर्यात बढ़ेगी तो कच्चे माल के आयात भी बढ़ेंगे | 

4 ) भारतीय शहरों के आधारभूत संरचना पर विशेष ध्यान देना, क्यूंकि यह अर्थव्यवस्था के इंजन है | 

5 ) महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी बढ़ाने हेतु विशेष प्रयास | 

6 ) स्टार्टअप संस्कृति और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना 

7 ) उभरते हुए क्षेत्रों में नवाचार और शोध को बढ़ावा देना 

8 ) कृषि क्षेत्र में उत्पादन को बढ़ावा देना 

अतः अगर हम हमारी कृषि, हमारे शहर, महिलाओं, मानव संसाधन के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य, हुनर प्रशिक्षण, रोज़गार के अवसर के लिए निर्यात, स्टार्टअप, लघु उद्योग, उभरते हुए क्षेत्र, नवाचार एवं शोध को प्राथमिकता देते हैं तो निश्चित तौर पर हमें इस सटीक खर्च का गुणक प्रभाव दिखेगा | इससे अर्थव्यवस्था में एक ‘लचीलापन’, ‘एक स्थिरता’ आएगी जो एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था का सूचक है | 

अतः मैं ‘‘श्री निर्मला सीतारामन्’ से वैज्ञानिक तथ्यों को रखते हुए, प्राथमिकता, स्पष्ट लक्ष्य, एवं सटीक विधि को दर्शाते हुए ‘एक हज़ार करोड़ रूपए’ के खर्च से चार उभरते हुए शहरों में (एक पूर्व, एक पश्चिम, एक उत्तर एवं एक दक्षिण में स्थित) चार ‘निर्यात एवं नवाचार संस्थान’ (एक्सपोर्ट एंड इनोवेशन इंस्टीट्यूट्स) के निर्माण की मांग रखता हूँ | यानी एक संस्थान के लिए 250 करोड़ रूपए | इसके लिए जमीन राज्य सरकारें मुहैया करें | कोई भी राज्य सरकार ऐसे संस्थान के लिए रूचि ही दिखाएगी | 

इन संस्थानों में निम्नलिखित सेवाएं दी जाएं – 

1 ) इनमें महिलाओं का 50 प्रतिशत आरक्षण हो | 

2 ) इनमें उभरते हुए क्षेत्रों में हुनर प्रशिक्षण दी जाए | 

3 ) इनमें कृषि से सम्बंधित नवाचार की प्रशिक्षण दी जाए | 

4 ) इनमें शहरी संरचनाओं के नवाचार की पढाई हो | 

5 ) इनमें भारत के निर्यात एवं आयात सम्बंधित शोध हो | 

6 ) इनमें लघु उद्योगों की स्तिथि पर शोध हो | 

7 ) इनमें स्टार्टअप पर केस स्टडी की जाए, उन्हें सहायता दी जाए |

8 ) इनमें शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध हो | 

9 ) इनमें उपयुक्त नेतृत्व की व्यवस्था एवं प्रवेश परीक्षा हो | 

10) निर्यात एवं नवाचार इनका मुख्य ध्येय हो |

अगर इस मांग को माना जाता है तो आने वाले वर्षों में यही एक हज़ार करोड़ भारत को कई गुणा वापिस होकर मिलेंगे | आशा है वित्त मंत्री इस पर ध्यान देंगीं | 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here