खिड़की, गौरैया और वह चाँदनी (मातृत्व दिवस पर विशेष)

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मई की वह दोपहर आग उगल रही थी। पुराने पुश्तैनी घर के आँगन में धूप ऐसे बिछी थी मानो किसी ने तप्त सुनहरे काँच के हज़ारों टुकड़े ज़मीन पर बिखेर दिए हों। हवा ठहरी हुई थी, पर मिट्टी से वह सोंधी और नमी वाली महक रह-रहकर उठ रही थी, क्योंकि माँ ने अभी-अभी तुलसी के चौरे पर ताज़ा पानी छिड़का था।

पाँच साल का क्षितिज, पसीने से लथपथ, नंगे पाँव गर्म फर्श पर थप-थप करता दौड़ रहा था। उसके पीछे उसकी माँ थीं। यह उनका नित्य का अनुष्ठान था—’लुका-छिपी’। माँ कभी अनाज के उस विशाल पीतल के डिब्बे के पीछे छिप जातीं, तो कभी रसोई के भारी लकड़ी के किवाड़ की ओट लेतीं।

तभी माँ ने उसे आवाज़ दी, “बस कर क्षितिज! देख तेरा चेहरा कैसा टमाटर जैसा लाल हो गया है। इधर आ।”

क्षितिज हाँफता हुआ उनके पास पहुँचा। माँ ने अपनी साड़ी के पल्लू से उसके माथे और गर्दन का पसीना पोंछा। उनके स्पर्श में वह शीतलता थी जो जलते हुए तन को शांत कर देती थी। उन्होंने रसोई से पीतल का एक भारी गिलास निकाला, जिसकी सतह पर बाहर की ओर पानी की नन्ही बूँदें जम गई थीं।

“ये ले, पहले इसे पी। खास तेरे लिए बनाया है।”

वह आम पन्ना था। कच्चे आम को भूनकर, उसमें पुदीने की ताज़गी, काला नमक, भुना हुआ जीरा और थोड़ी सी मिश्री मिलाकर माँ ने उसे तैयार किया था। जैसे ही क्षितिज ने पहला घूँट लिया, उसे लगा मानो उसके भीतर कोई ठंडा झरना बहने लगा हो। पुदीने की महक उसकी साँसों में बस गई और आम का वह खट्टा-मीठा स्वाद उसकी थकान को सोखने लगा। माँ उसे पीते हुए बड़े प्यार से देख रही थीं, मानो उसकी प्यास बुझते देख उनकी अपनी आत्मा तृप्त हो रही हो।

“धीरे पी, कहीं गले में न लग जाए,” उन्होंने उसके बिखरे बालों को संवारते हुए कहा। उनके हाथों से हल्दी और पुदीने की मिली-जुली गंध आ रही थी—ममता की अपनी एक अलग महक।

क्षितिज ने गिलास खाली किया और एक लंबी संतुष्ट डकार ली। माँ मुस्कुराईं और उसके गाल को हल्के से थपथपाया। इसी तृप्ति के क्षण में, जब वह गिलास रखने के लिए पलटा, उसकी नज़र आँगन के उस कोने पर पड़ी जहाँ नीम की छाया थोड़ी गहरी थी।

वहाँ, सूखे पत्तों के ढेर के बीच वह छोटी सी गौरैया पड़ी थी।

उसका बायाँ पंख एक अस्वाभाविक कोण पर मुड़ा हुआ था। वह अपने नन्हे पंजे मिट्टी में गड़ाकर खुद को खींचने की कोशिश कर रही थी, पर हर कोशिश के साथ उसकी चोंच से एक बेआवाज़ चीख निकलती। उसकी छोटी काली आँखों में वह आदिम भय था, जो मृत्यु के निकट होने पर हर जीव में होता है।

क्षितिज का चेहरा एकाएक पीला पड़ गया। वह पत्थर की मूरत बन गया। “माँ… देखो… यह टूट गई है।”

माँ दौड़कर आईं। उन्होंने गौरैया की हालत देखी और बिना बोले उसे अपनी हथेलियों के संपुट में उठा लिया। उन्होंने उसे इतने धीमे से उठाया जैसे वे हवा के किसी बुलबुले को टूटने से बचा रही हों। गौरैया की धड़कन माँ की हथेली के मांस को रह-रहकर ठोक रही थी—धक्-धक्, धक्-धक्।

“क्या ये मर जाएगी?” क्षितिज की आवाज़ काँप रही थी।

माँ ने रसोई की ओर कदम बढ़ाए। “मरना और जीना हमारे हाथ में नहीं है, क्षितिज।

पर जो हमारे हाथ में है, वह है—सेवा।”

रसोई का कोना एक अस्थायी अस्पताल बन गया। माँ ने पत्थर की सिल पर हल्दी घिसी। पीली, ताज़ा हल्दी की तीखी महक पूरे कमरे में फैल गई। रूई के एक फाहें को उन्होंने गुनगुने पानी में डुबोया और गौरैया के उस मुड़े हुए पंख को साफ़ करने लगीं। क्षितिज वहीं फर्श पर उकड़ू बैठा अपनी साँसें रोककर देख रहा था।

“माँ, आप इसे इतना धीरे क्यों छू रही हो? जल्दी लेप लगा दो न,” वह व्याकुलता में बोला।

माँ ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा। उनकी आँखों में वह ठहराव था जो केवल गहरे प्रेम से आता है। उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “क्योंकि बेटे, दर्द को हमेशा धीरे छूना चाहिए। ज़ोर लगाओगे तो घाव तो भर जाएगा, पर भरोसा टूट जाएगा।”

अगले दो हफ़्तों तक वह पुराना जूते का डिब्बा, जिसमें माँ ने मलमल का पुराना कुर्ता बिछाया था, क्षितिज का पूरा संसार बन गया। वह सुबह उठते ही सबसे पहले गौरैया की जाँच करता। उसने उसे ‘मैडम चिड़िया’ नाम दिया था। वह उसे कटोरी से बाजरा खिलाता, अपनी छोटी उँगली से पानी की बूंदें उसकी चोंच तक पहुँचाता।

एक शाम, जब बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, माँ रसोई से बाहर आईं। उन्होंने देखा कि क्षितिज गौरैया के डिब्बे को कसकर अपनी छाती से लगाए बैठा है।

“क्षितिज, अगर यह ठीक होकर उड़ गई तो?” माँ ने धीमे से पूछा।

क्षितिज ने झटककर कहा, “नहीं माँ! यह मेरी दोस्त है। यह यहीं रहेगी।”

माँ उसके पास ज़मीन पर बैठ गईं। “बेटा, दोस्ती का मतलब पिंजरा नहीं होता। जो प्यार बाँध ले, वह मोह है; जो पंख दे दे, वही असली प्रेम है।”

तीन दिन बाद, एक सुनहरी सुबह गौरैया ने अचानक ज़ोर से पंख फड़फड़ाए। माँ ने चुपचाप कमरे की वह खिड़की पूरी खोल दी। गौरैया ने एक बार गर्दन घुमाकर पीछे देखा और फिर—फुर्र। वह नीले विस्तार में विलीन हो गई।

क्षितिज का गला रुँध गया। “वह चली गई… उसने एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा?”

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा। “वह गई नहीं है, क्षितिज। वह मुक्त हुई है। उसका लौट आना ही तुम्हारा इनाम होगा।”

गौरैया अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी, लेकिन क्षितिज के बाल-मन के लिए वह अब भी एक ‘अधूरी कहानी’ थी। वह रोज़ सुबह आती, खिड़की की मुंडेर पर बैठती, क्षितिज के रखे बाजरे के दानों को अपनी छोटी चोंच से टप-टप करती और पानी पीकर फुर्र से उड़ जाती। वह न तो पहले की तरह उसकी उँगली पर बैठती और न ही उसके बुलाने पर रुकती।

एक शाम, जब आसमान में सिंदूरी रंग घुल रहा था, क्षितिज ने झुँझलाकर अपनी माँ से कहा, “माँ, यह कितनी स्वार्थी है! बस आती है, अपना पेट भरती है और चली जाती है। मेरे साथ खेलती भी नहीं। मैंने इसकी जान बचाई थी, क्या इसे याद नहीं?”

माँ उस समय आँगन में जलते दीये की लौ को हवा से बचा रही थीं। उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और उसके उलझे बालों को सुलझाते हुए कहा, “बेटा, उसकी आज़ाद उड़ान ही उसका धन्यवाद है। उसका हर सुबह लौट आना ही उसका प्रेम है। हर रिश्ता साथ बैठने से नहीं बनता, कुछ रिश्ते लौट आने के वादे से भी बनते हैं।”

क्षितिज ने होंठ सिकोड़ लिए। उसे माँ की बात तब समझ नहीं आई। उसे लगा जो प्यार करता है, वह पास रहता है, उड़ता नहीं।

***

साल बीत गए। आँगन छोटा पड़ गया, शहर बड़े हो गए। किताबों, कॉलेज, नौकरी और भागती हुई ज़िंदगी के बीच बहुत कुछ बदल गया, पर एक चीज़ नहीं बदली—क्षितिज का पक्षियों से प्रेम। जब भी जीवन बहुत शोर करने लगता, वह किसी शांत जगह की तलाश में निकल जाता—झीलों के पास, जंगलों में, पक्षी अभयारण्यों में। उसे लगता, पक्षियों की दुनिया में कोई दिखावा नहीं होता। वहाँ बस मौसम है, भूख है, प्रेम है और उड़ान।

अब वह एक बर्ड वॉचर था। कैमरा उसके कंधे का हिस्सा बन चुका था, नोटबुक हमेशा जेब में रहती, और उसकी आँखें अब भी बचपन वाली जिज्ञासा से भरी थीं। किसी पक्षी को उड़ते देखना उसे हमेशा माँ की याद दिलाता। उसे लगता, उस दिन माँ ने सिर्फ़ गौरैया को नहीं उड़ाया था—उन्होंने उसके भीतर भी कुछ खोल दिया था।

मई 2026 की एक सर्द सुबह, वह भरतपुर के ‘केवलादेव नेशनल पार्क’ में था। हवा में कीचड़, सड़ी हुई पत्तियों और ताज़ा ओस की एक मिली-जुली गंध थी।

“साहब, ज़रा बायीं तरफ देखिए,” उसके गाइड माधव ने फुसफुसाते हुए कहा।

क्षितिज ने अपने कैमरे का ज़ूम लेंस घुमाया। लेंस के भीतर की दुनिया इतनी साफ़ थी कि उसे एक पेंटेड स्टॉर्क (Painted Stork) के पंखों पर जमी ओस की नन्ही बूंदें साफ़ नज़र आ रही थीं। वह पक्षी अपने विशाल, मटमैले सफ़ेद और गुलाबी किनारों वाले पंखों को फैलाए धूप सेंक रहा था, जैसे कोई कलाकार अपने कैनवास को सूखने के लिए छोड़ देता है।

हवा में एक अजीब-सी सिहरन थी। कोहरे की महीन चादर झील के मटमैले पानी पर तैर रही थी। सड़ी हुई वनस्पतियों की तीखी गंध और ताज़ी ओस की नमी मिलकर एक ऐसी खुशबू रच रही थी जो केवल अछूते जंगलों में मिलती है।

माधव ने बिना आवाज़ किए एक ऊँचे पेड़ की सूखी टहनी की ओर इशारा किया। “साहब, उधर…”

वहाँ एक किंगफिशर (Kingfisher) पत्थर की मूर्ति की तरह जमा हुआ था। उसकी फिरोज़ी नीली पीठ धूप में किसी कीमती नीलम की तरह चमक रही थी। अचानक, एक पल के भीतर, वह एक नीली बिजली की तरह पानी की सतह को चीरते हुए नीचे गया। छपाक! एक मामूली-सी आवाज़ हुई और अगले ही पल वह अपनी चोंच में छटपटाती हुई चाँदी जैसी मछली दबाए वापस अपने स्थान पर था। मछली के तड़पने से पानी की कुछ बूंदें हवा में उछलीं और इंद्रधनुष की एक नन्ही लकीर बनाकर ओझल हो गईं।

क्षितिज ने अपनी दूरबीन को थोड़ा और आगे घुमाया। दूर दलदल के उथले पानी में सारस (Sarus Crane) का एक जोड़ा खड़ा था। उनकी लंबी, सलेटी काया और सिर पर गहरा लाल रंग उन्हें किसी राजसी दरबारी जैसा लुक दे रहा था। अचानक उन्होंने अपनी गर्दनें आसमान की ओर उठाईं और एक सुर में ऐसी लंबी गूँज पैदा की जो पूरे सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक निकल गई। यह आवाज़ किसी प्राचीन गीत की तरह थी—गहरी, सुरीली और थोड़ी रहस्यमयी।

ऊपर की ओर, बबूल के काँटेदार पेड़ों से बया (Weaver Bird) के घोंसले लालटेन की तरह लटक रहे थे। हवा के हर झोंके के साथ वे लयबद्ध तरीके से झूल रहे थे। उनकी जटिल बुनावट को देखकर क्षितिज को ताज्जुब हुआ कि बिना किसी औज़ार के, सिर्फ़ एक नन्ही चोंच ने घास के रेशों से यह वास्तुकला कैसे रच दी होगी। झील के बीचों-बीच पेलिकन (Pelican) का एक विशाल झुंड तैर रहा था। उनकी भारी चोंच और शांत गति उन्हें पानी पर तैरते हुए किसी युद्धपोत के बेड़े जैसा बना रही थी।

तभी माधव का स्वर धीमा और भारी हो गया। उसने एक बिल्कुल नंगे, सूखे ठूँठ की ओर इशारा किया जो किसी कंकाल की तरह खड़ा था।

“साहब, यहाँ कभी गिद्धों (Vultures) का इतना शोर होता था कि कान फट जाएँ,” माधव ने एक लंबी साँस ली। “पर हमने अपनी गाय-भैंसों के इलाज में ऐसी दवाइयाँ मिला दीं कि इन कुदरत के सफ़ाईकर्मियों के गुर्दे ही पत्थर बन गए। हज़ारों की आबादी हफ़्तों में साफ़ हो गई। अब ये पेड़ सूने हैं।”

उसने हाथ के इशारे से दूर क्षितिज पर फैले सुनहरे घास के मैदानों को दिखाया। “वहाँ गोडावण (Great Indian Bustard) का घर था। भारी पक्षी है साहब, ऊँची उड़ान नहीं भर पाता। जब उड़ता है, तो बिजली के इन ऊँचे तारों को देख नहीं पाता और पल भर में जलकर राख हो जाता है। हम अपनी रोशनी के चक्कर में उनके आसमान में अँधेरा फैला रहे हैं।”

क्षितिज ने कैमरा नीचे कर लिया। उसे लगा जैसे उसके हाथ में मौजूद तकनीक और बाहर फैला यह संसार, दोनों ही किसी गहरी त्रासदी का हिस्सा हैं। उसे महसूस हुआ कि यह पूरी पृथ्वी ही उस गौरैया की तरह है—घायल, काँपती हुई और मदद के लिए पुकारती हुई। फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि अब माँ नहीं थीं जो हल्दी का लेप लगा सकें; अब यह ज़िम्मेदारी उसकी अपनी थी।

उसने महसूस किया कि एक फोटोग्राफर के तौर पर वह सिर्फ़ तस्वीरें नहीं ले रहा था, बल्कि एक लुप्त होती सभ्यता के आखिरी निशानों को दर्ज कर रहा था। तभी, झाड़ियों के पीछे से एक हल्की-सी आहट हुई, क्षितिज ने चौकस होकर अपना कैमरा घुमाया, पर लेंस के दायरे में कोई पक्षी नहीं, बल्कि एक जोड़ी बड़ी, डरी हुई आँखें उभरीं।

वह चाँदनी थी।

***

एक छोटी सी बच्ची, जिसकी उम्र शायद सात या आठ साल रही होगी। उसकी मैली फ्रॉक का रंग उड़ चुका था और उसके नंगे पाँव धूल और काँटों की खरोंच से भरे थे। उसके सामने एक फटे हुए बोरे पर पत्थर के छोटे-छोटे खिलौने और सूखे बेर सजे थे। वह पत्थर की उन मूर्तियों की तरह शांत बैठी थी, पर उसकी आँखों में वही आदिम छटपटाहट थी जो क्षितिज ने बरसों पहले उस घायल गौरैया में देखी थी—एक ऐसा डर जो आवाज़ नहीं करता, बस भीतर ही भीतर काँपता है।

क्षितिज एक पल के लिए उसके पास से गुज़रा। उसका दिमाग पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियों और उनके डेटा में उलझा था। पर पाँच कदम आगे बढ़ते ही उसके भीतर जैसे बिजली कौंधी। उसे लगा जैसे किसी ने पीछे से उसकी कमीज़ खींची हो। माँ की वह पुरानी बात हवा के झोंके की तरह कानों में गूँजी— “बेटे, दर्द को हमेशा धीरे छूना चाहिए।”

वह रुका, पलटा और वापस चाँदनी के पास गया। वह धीरे से घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया, ताकि वह डरे नहीं।

“यह पत्थर के पक्षी तुमने बनाए हैं?” उसने बहुत धीमे से पूछा। चाँदनी ने अपनी उँगलियों से ज़मीन की धूल कुरेदी और धीरे से सिर हिलाया। “क्या तुम स्कूल जाना चाहोगी?”

यह सवाल चाँदनी के लिए इतना अपरिचित था जैसे किसी ने उससे दूसरे ग्रह की भाषा में बात की हो। उसने अपनी सूखी आँखों से क्षितिज को देखा और एक ऐसी आवाज़ में बोली जिसमें शिकायत नहीं, सिर्फ स्वीकार था— “साहब, मेरे लिए कौन करेगा? माँ-बाप तो हैं नहीं, बस ये पत्थर हैं और ये जंगल।”

क्षितिज के सीने में एक तेज़ टीस उठी। उसने माधव की ओर देखा, जो दूर खड़ा यह सब देख रहा था। क्षितिज ने चाँदनी के धूल भरे हाथ को धीरे से छुआ और शांत स्वर में कहा,

“मैं करूँगा। आज से तुम्हारी पढ़ाई का ज़िम्मा मेरा।”

माधव अचरज में पास आया।

“साहब, यहाँ पगडंडियों पर ऐसी हज़ारों चाँदनी मिलेंगी। आप कितनों का बोझ उठाएँगे? आप तो यहाँ सिर्फ तस्वीरें लेने आए थे।”

क्षितिज ने दूर क्षितिज पर उड़ते एक अकेले पक्षी को देखा और मुस्कुराया।

“माधव, यह बोझ नहीं है। यह उस गौरैया का पुराना ऋण है जो सालों से मुझ पर उधार था। आज मुझे इस बच्ची में वही टूटा हुआ पंख दिखा है जिसे माँ ने हल्दी लगाई थी। अगर मैं आज आगे बढ़ गया, तो मैं अपनी माँ की उस सीख को हमेशा के लिए खो दूँगा।”

कुछ हफ़्तों बाद, जब क्षितिज फिर से पार्क पहुँचा, तो नज़ारा बदल चुका था।

चाँदनी पगडंडी के किनारे अपनी नई नीली स्कूल यूनिफॉर्म में खड़ी थी। उसके बाल सलीके से बँधे थे और कंधे पर एक नया बस्ता था। जैसे ही उसने क्षितिज को देखा, उसके चेहरे पर एक ऐसी दमक आई जो सुबह की पहली किरण से भी ज़्यादा चमकदार थी। वह दौड़कर उसके पास आई, अपनी किताबों वाला थैला दिखाया और फिर—ठीक उसी गौरैया की तरह—एक पल को ठिठकी, अपनी आज़ादी की नई चमक दिखाई, और फिर हँसते हुए अपने स्कूल की ओर दौड़ गई।

वह भागी, कुछ दूर जाकर रुकी, पीछे मुड़कर ज़ोर से हाथ हिलाया—जैसे वह अपनी कृतज्ञता का संदेश भेज रही हो—और फिर अपने नए भविष्य की ओर उड़ गई।

क्षितिज वहीं खड़ा उसे देखता रहा। उसे अब समझ आया कि माँ ने उस दिन क्या कहा था— लौट आना ही प्रेम है, और उड़ जाना ही सार्थकता।

उस रात केबिन में सन्नाटा था, पर वह सन्नाटा भारी नहीं था। क्षितिज ने मेज़ पर अपना पुराना ‘बर्ड एल्बम’ खोला। उसने माँ की वह श्वेत-श्याम तस्वीर निकाली जहाँ वे आँगन में खड़ी मुस्कुरा रही थीं। उसने उस तस्वीर के बगल में चाँदनी की वह फोटो रखी जो उसने आज खींची थी—एक उड़ती हुई उम्मीद की तस्वीर।

खिड़की खुली थी और रात की ठंडी हवा के झोंके कमरे के भीतर आ रहे थे। क्षितिज ने आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली। उसे लगा कि माँ कहीं नहीं गईं। वे उस हवा की ठंडक में थीं जो उसके माथे को सहला रही थी। वे उस आम पन्ने की ताज़गी में थीं जो आज भी उसकी रूह को तर कर देती थी। वे उस हल्दी की खुशबू में थीं जिसने आज एक और ज़ख्म भर दिया था।

माँ शरीर से चली गई थीं, पर उनकी दी हुई वह संवेदना— ‘दर्द को धीरे छूना’—आज भी उसके हाथों में धड़क रही थी। वह मातृत्व उसके भीतर एक स्थायी झरने की तरह बह रहा था। उसे महसूस हुआ कि माँ की ममता किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं थी, वह तो उस करुणा में थी जो वह आज चाँदनी को दे पाया था।

क्षितिज ने एक लंबी, तृप्त साँस ली और बिस्तर पर लेट गया। बहुत वर्षों बाद, उसे वैसी ही गहरी और बेफिक्र नींद आई, जैसी बचपन में माँ के पल्लू की शीतल छाँव में आती थी। बाहर जंगल की लोरी जारी थी, और उसकी रूह में एक घायल गौरैया अब पूरी तरह मुक्त होकर चहक रही थी।

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