काला भूरा सफ़ेद

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पुराने शहर के आख़िरी सिरे पर एक बंद पड़ी फैक्ट्री थी, जहाँ सड़क अचानक ख़त्म हो जाती थी, जैसे शहर ने आगे देखने से मना कर दिया हो। दीवारों पर सीलन जमी रहती थी, लोहे पर जंग की मोटी परत थी, और ज़मीन पर तेल, धूल और बरसों पुरानी बारिश की गंध मिली रहती थी। हवा चलती तो टूटी खिड़कियों से एक लगातार सीटी निकलती—न तेज़, न धीमी—बस थकी हुई, जैसे कोई मशीन अब भी किसी भूले हुए काम को दोहरा रही हो। इंसान वहाँ नहीं आते थे, पर जगह खाली भी नहीं थी।

वहीं तीन जानवर रहते थे। दो कुत्ते और एक बिल्ली।

भूरा सबसे पुराना था। उसकी चाल में जल्दबाज़ी नहीं थी। पीठ थोड़ी झुकी हुई थी, जैसे शरीर ने समय से पहले हार नहीं मानी हो, बस हिसाब कर लिया हो। दाहिने कान पर पुराना ज़ख़्म था, जो कभी पूरी तरह भरा नहीं। उसकी आँखों में चौकन्नापन रहता था, पर उसके नीचे एक ऐसी थकान भी थी जो नींद से नहीं जाती। वह सुबह उठते ही नहीं चलता था। पहले हवा को सूँघता, ज़मीन देखता, आवाज़ों को तौलता। उसे पता था कि हर दिन नया नहीं होता, लेकिन हर दिन नुकसान पहुँचा सकता है।

काला जवान था। उसकी टाँगों में फुर्ती थी और गर्दन में अकड़। उसकी आँखों में वह चमक थी जो सोचने से पहले दौड़ना चाहती है। उसे लगता था कि दुनिया उसी की सुनती है जो पहले पहुँचता है। जो रुकता है, वह पीछे रह जाता है। वह भूरा को मानता था, पर उस मानने में बेचैनी थी। भूरा अक्सर सही निकलता था, और काला को सही होना नहीं—आगे होना अच्छा लगता था। उसे लगता था कि भूरा ज़्यादा सोचता है और कम दिखाता है।

सफ़ेद बिल्ली थी। वह ज़्यादातर ज़मीन पर नहीं रहती थी। दीवारों के किनारों पर, टूटी मशीनों के ऊपर, खिड़कियों के अधूरे फ्रेम पर। ऊपर से चीज़ें साफ़ दिखती थीं, नीचे अक्सर बस शोर होता था। उसकी आँखें पीली थीं—देखने वाली, पूछने वाली नहीं। वह किसी की नहीं थी, फिर भी दोनों कुत्तों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी थी। उसकी मौजूदगी न हो तो जगह ज़्यादा खाली लगती थी, जैसे कोई ज़रूरी आवाज़ अचानक ग़ायब हो गई हो।

सुबहें लगभग एक जैसी होती थीं। भूरा सबसे पहले जागता था, पर उठता नहीं था। अगर हवा में वही पुरानी गंधें होतीं—जंग, मिट्टी, कुत्ता, बिल्ली—तो वह धीरे से खड़ा होता। काला तब तक जाग चुका होता, पर जानबूझकर आँखें बंद रखता। उसे अच्छा लगता था कि कोई उसे आख़िरी समझे। सफ़ेद कभी ऊपर बैठी होती, कभी नीचे उतर आती। वह सुबह को नियंत्रित नहीं करती थी। वह देखती थी कि कौन क्या चुन रहा है।

खाना हमेशा कम होता था। कभी मिलता, कभी नहीं। एक दिन किसी ने सूखी रोटी का टुकड़ा फेंका। बहुत बड़ा नहीं था। तीन पेटों के लिए कम था। भूरा पहुँचा, सूँघा, और पंजे से रोटी को दो हिस्सों में कर दिया। एक हिस्सा काला की ओर सरका दिया, दूसरा वहीं रख छोड़ा। यह दया नहीं थी। यह अनुभव था। काला खाते हुए ऊपर देखने लगा। सफ़ेद ऊपर बैठी थी। उसकी आँखों में न भूख थी, न लालच। भूरा ने अपना हिस्सा नहीं छुआ। थोड़ी देर बाद सफ़ेद नीचे उतरी और बहुत छोटा कौर लिया—बस उतना कि संतुलन बना रहे—फिर ऊपर चली गई। उस पल तीनों को एक-दूसरे से झुंझलाहट भी थी और आदत भी, जैसे साथ रहना किसी ने चुना न हो, पर छोड़ पाना भी आसान न हो।

एक दोपहर हवा बदली। गंध बदली। यह उस जगह की नहीं थी। किसी और कुत्ते की गंध थी। भूरा तुरंत सख़्त हो गया। उसके शरीर ने पहले ही समझ लिया। काला ने गंध को चुनौती की तरह लिया। उसकी गर्दन तन गई। वह आगे बढ़ना चाहता था। उसे लगा यही समय है अपनी जगह साबित करने का। सफ़ेद ऊपर से देख रही थी। उसे कुत्तों का यह अधिकार भाव हमेशा खटकता था, इसलिए वह जानबूझकर नीचे कूदी। आवाज़ तेज़ थी, अनावश्यक थी, पर ज़रूरी भी।

कोने से अजनबी कुत्ता दिखा—दुबला, थका हुआ। आँखों में हिंसा नहीं थी, बस भूख। भूरा आगे बढ़ा। उसने भौंका नहीं। सिर थोड़ा झुकाया। यह हमला नहीं था। यह सीमा थी। अजनबी कुछ पल रुका, फिर चला गया। उसकी गंध देर तक हवा में टिकी रही। काला चुप हो गया। उस चुप्पी में नाराज़गी थी। उसे लगा भूरा डर गया। उसे लगा उसकी ताक़त बेकार गई। उसी रात वह भूरा से दूर सोया और अगली सुबह बिना देखे, बिना रुके, फैक्ट्री की सीमा पार कर गया।

सीमा पार करते ही हवा बदल गई। गंधें तेज़ थीं—कूड़े की सड़ांध, पेट्रोल की चुभन, पसीने और धुएँ का मिला-जुला स्वाद। ज़मीन गर्म थी। पत्थर ज़्यादा थे। सूरज खुला था और छाया टूटी हुई। काला रुका नहीं। पहले मोड़ पर उसे खाना मिला—बासी चावल, आधी सड़ी सब्ज़ियाँ। उसने बिना सूँघे खाया। पेट भरा, मन हल्का हुआ। सड़क के किनारे दौड़ते हुए एक गाड़ी गुज़री। हवा ने उसे पीछे धकेला। उसने मुँह खोला, जैसे खतरा कोई खेल हो।

दोपहर तक पंजों में जलन होने लगी। उसने रुककर नहीं देखा। आगे बढ़ना उसने सीखा था, रुकना नहीं। तभी उसे एक झुंड दिखा। तीन कुत्ते। आँखें संकरी। पूँछें सख़्त। काला ने छाती फुलाई, आवाज़ निकाली और आगे बढ़ा। कुछ पल तक घेराव हुआ, फिर दाँत चमके। एक ने उसके कंधे में काटा। दर्द बिजली की तरह दौड़ा। वह छूटा और भागा। सड़क सामने थी।

उसी समय गाड़ी आई। तेज़। बहुत पास। उसने छलाँग लगाई। पिछला पंजा फिसला। झटका लगा। फिर शोर दूर हो गया। वह सड़क के किनारे पड़ा था। साँस तेज़ थी। पैर साथ नहीं दे रहा था। गंध बदल गई थी—खून और डर की। पहली बार उसे लगा कि दुनिया उसकी चाल से नहीं चलती।

फैक्ट्री में भूरा बेचैन था। हवा में खालीपन था। उसने दौड़ नहीं लगाई। उसने समय लिया। सफ़ेद नीचे उतरी और बहुत हल्के से एक दिशा काटी। भूरा चला—धीरे, बिना आवाज़, उन रास्तों से जहाँ गंध पतली थी। शाम तक उसे दर्द की गंध मिल गई। रात तक काला मिल गया।

भूरा पास खड़ा रहा। भौंका नहीं। अपने कंधे से उसे सहारा दिया। गाड़ी फिर गुज़री। भूरा ने काला को सड़क से खींचकर छाया में किया। थोड़ा पानी मिला। काला ने पिया। आँखें खुली रहीं। यह जीत नहीं थी, न कोई बहादुरी। बस इतना था कि कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई।

बरसात के बाद की सुबह फैक्ट्री अलग लगती थी। दीवारों पर धूप पड़ रही थी और ज़मीन से सोंधी गंध उठ रही थी। काला उठा। पंजा रखते ही हल्की जलन हुई—इतनी कि वह रुक जाए। साँस अब तेज़ नहीं थी, पर पूरी तरह सहज भी नहीं। भूरा पास खड़ा था। न आगे बढ़ा, न पीछे हटा। उसकी स्थिरता आदेश नहीं थी, बस मौजूदगी थी। सफ़ेद ऊपर से नीचे उतरी, पास आई, पर छूने की दूरी पर नहीं रुकी। उसकी आँखें हवा में थीं।

काला चला। हर क़दम सोचकर। गीली मिट्टी पंजों से चिपकती थी। ठंडे पत्थर अब जलाते नहीं थे। उसने फैक्ट्री की सीमा की ओर देखा। बाहर की गंध अब भी बुलाती थी। उसका शरीर एक पल को आगे झुका, फिर पंजे में हल्की टीस उठी—दर्द नहीं, याद। वह रुका, पीछे हटा और दीवार के पास लेट गया।

बरसात थमने के बाद फैक्ट्री के आसपास की हवा बदल गई थी। दिन में हल्की धूप दीवारों पर फैल जाती और जंग को थोड़ी देर के लिए नरम बना देती, जैसे लोहे को भी आराम मिल रहा हो। काला जब बाहर निकलता तो हवा उसके शरीर से टकराकर आगे निकल जाती—न ठंडी, न गरम—बस चलती हुई, जैसे उसे खींचने या रोकने का इरादा न हो। ज़मीन अब कठोर नहीं थी; गीली मिट्टी पंजों के नीचे दब जाती और दर्द को सीधे वापस नहीं उछालती। कहीं-कहीं पानी ठहरा रहता, जिसमें वह अपना टूटा हुआ प्रतिबिंब देखता और आगे बढ़ जाता। सुबह चिड़ियाँ आतीं, पास नहीं, दूर से—उनकी आवाज़ें हवा में टिकतीं और फिर गायब हो जातीं, जैसे समय को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट रही हों। रात को चाँद निकलता, पूरा नहीं, पर काफ़ी—इतना कि चीज़ें दिखें और डर पूरी तरह गाढ़ा न हो। काला देर तक बैठा रहता, कभी आँखें बंद, कभी खुली। उसका पैर अब भी दुखता था, पर हवा, पानी, धूप, आवाज़ें और रात की ठंडक मिलकर दर्द को चुनौती नहीं देती थीं—वे बस उसके आसपास रहती थीं, और उसी में वह धीरे-धीरे फिर से चलना सीख रहा था।

शाम को थोड़ी रोटी मिली। काला आगे बढ़ा, फिर रुका। उसने रोटी को सूँघा और आधा कर दिया। एक हिस्सा भूरा की ओर सरकाया। सफ़ेद पास की दीवार से नीचे उतरी, बहुत पास नहीं आई, बस इतनी कि उसकी मौजूदगी महसूस हो। उसने रोटी को देखा नहीं, सिर्फ़ ज़मीन को सूँघा और वहीं बैठ गई। किसी ने कुछ नहीं कहा।

रात आई। फैक्ट्री वैसी ही थी—जंग, सीलन, वही पुरानी सीटी। बाहर की दुनिया भी वहीं थी, अपने शोर और रोशनी के साथ, जैसे जानती हो कि आज यहाँ कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं। भूरा लेट गया। काला उसके पास बैठा रहा। सफ़ेद ऊपर चढ़कर खिड़की के अधूरे फ्रेम पर टिक गई।

तीन शरीर एक ही जगह थे—एक ज़मीन पर, एक दीवार से सटा हुआ, एक ऊपर। तीनों थके हुए थे, पर चौकन्ने। और यह चुप्पी इस बार भारी नहीं थी। इसमें डर नहीं था, न जल्दबाज़ी। यह वह चुप्पी थी जो तब आती है जब कोई भाग चुका हो, लौट आया हो, और अब कहीं जाने की ज़रूरत न हो।

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