ईद का चाँद

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शाम उस दिन कुछ ज़्यादा ही धीरे उतर रही थी—जैसे समय खुद ठहरकर इस पल को थोड़ा और लंबा करना चाहता हो। आसमान में हल्का नीला रंग फैला था, जो धीरे-धीरे धूसर में बदल रहा था, और फिर कहीं दूर क्षितिज पर गहराता हुआ अंधेरा उसे अपने भीतर समेटने लगा था। हवा में एक कोमल ठंडक थी, और उसके साथ घुली हुई थी रसोईयों से उठती सेवइयों की मीठी खुशबू—जिसमें इलायची, दूध और घर की गर्माहट एक साथ मिलकर जैसे कोई अनदेखी कविता रच रहे थे।

नीचे गलियों में जीवन अपनी पूरी चहल-पहल के साथ बह रहा था। बच्चे नए कपड़ों में इधर-उधर दौड़ रहे थे—किसी का कुर्ता थोड़ा बड़ा था, किसी की टोपी बार-बार सरक रही थी, लेकिन उनके चेहरे पर जो चमक थी, वह किसी भी परफेक्ट कपड़े से ज़्यादा खूबसूरत थी। वे हर कुछ सेकंड में रुककर आसमान की ओर देखते—फिर एक-दूसरे से पूछते,

“दिखा क्या?”
और जवाब आता—
“अभी नहीं… बस आता ही होगा!”

बड़ों के चेहरों पर भी वही इंतज़ार था—थोड़ा संयमित, थोड़ा शांत, लेकिन उतना ही गहरा। कोई छत पर खड़ा फोन पर किसी रिश्तेदार से पूछ रहा था, कोई दूर के मस्जिद की आवाज़ पर कान लगाए था, और कोई बस चुपचाप आसमान को देख रहा था—जैसे वह किसी पुराने दोस्त का इंतज़ार कर रहा हो।

इसी हलचल से थोड़ा दूर, एक साधारण-सी छत पर खड़ा था सिद्धार्थ। वह शोर से अलग था, लेकिन उस शोर को महसूस कर रहा था। उसके हाथ ठंडी कंक्रीट की दीवार पर टिके थे, और उसकी नजर उस खाली आसमान पर जमी थी जहाँ चाँद को उगना था।

उसकी आँखों में सिर्फ जिज्ञासा नहीं थी—वहाँ एक सवाल था, जो शायद उसे खुद भी पूरी तरह समझ नहीं आ रहा था।

तभी पीछे से कदमों की हल्की-सी आहट आई।
“अभी तक नहीं आया?”

सिद्धार्थ ने मुड़कर देखा। जफ़र था—थोड़ा-सा हाँफता हुआ, जैसे जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़कर आया हो, लेकिन चेहरे पर वही सुकून भरी मुस्कान।

“नहीं,” सिद्धार्थ ने कहा,
“लेकिन मैं सोच रहा था… ये चाँद इतना खास क्यों है? मतलब… ये तो बस एक पतली-सी रेखा है… फिर इतना इंतज़ार क्यों?”

जफ़र उसके पास आकर खड़ा हो गया। उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने आसमान की ओर देखा—गहरा होता हुआ, शांत, जैसे उसमें कोई अनकही कहानी छुपी हो।

“क्योंकि,” उसने धीरे से कहा,
“ये सिर्फ चाँद नहीं है।”

सिद्धार्थ ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा—
“तो फिर क्या है?”

जफ़र ने गहरी साँस ली—
“ये एक एहसास है… पूरे महीने के रोज़ों के बाद का। यह सिर्फ भूखे-प्यासे रहने की बात नहीं है… यह अपने भीतर झाँकने की प्रक्रिया है। जब तुम खुद को रोकते हो, तब तुम्हें अपने आसपास की दुनिया अलग तरह से दिखने लगती है। तुम्हें याद आता है कि कोई और हर दिन भूखा सोता है… कोई हर दिन इंतज़ार करता है।”

सिद्धार्थ अब ध्यान से सुन रहा था।

“और फिर,” जफ़र ने कहा,
“यह चाँद उस पूरे अनुभव का अंत नहीं… बल्कि उसका उत्तर है। यह कहता है—अब जो सीखा है, उसे जीना शुरू करो।”

हवा थोड़ी और ठंडी हो गई थी। आसमान अब गहरा हो चुका था, लेकिन चाँद अभी भी कहीं छिपा हुआ था—जैसे वह इस बातचीत के पूरा होने का इंतज़ार कर रहा हो।

“लेकिन ये बातें इतनी आसानी से समझ नहीं आतीं,” जफ़र ने कहा,
“इन्हें समझने के लिए हमें कहानियों की ज़रूरत होती है।”

सिद्धार्थ ने सिर थोड़ा झुकाया—
“कौन-सी कहानियाँ?”

जफ़र हल्का-सा मुस्कुराया—
“तुम्हें पंच परमेश्वर याद है?”

सिद्धार्थ के चेहरे पर पहचान की एक हल्की-सी रेखा उभरी।
“जुम्मन शेख और अलगू चौधरी… बहुत अच्छे दोस्त।”

“हाँ,” जफ़र ने कहा,
“ऐसे दोस्त, जिनके बीच कोई दीवार नहीं थी—न धर्म की, न समाज की। वे साथ खाते थे, साथ जीते थे, और एक-दूसरे पर आँख बंद करके भरोसा करते थे।”

वह थोड़ा रुका, जैसे उस दोस्ती को महसूस कर रहा हो।
“लेकिन फिर एक दिन ऐसा आया… जब अलगू को पंचायत में फैसला सुनाना था… और सामने खड़ा था जुम्मन।”

सिद्धार्थ की आँखों में गहराई आ गई।

“सोचो,” जफ़र बोला,
“तुम्हारा सबसे करीबी दोस्त… तुम्हारे सामने खड़ा है… उम्मीद कर रहा है कि तुम उसका साथ दोगे। और तुम्हें पता है कि वह गलत है।”

हवा ने हल्का-सा झोंका लिया—जैसे उस पल का बोझ अपने साथ बहा रही हो।

“अलगू ने क्या किया?”

“उसने न्याय चुना,” सिद्धार्थ ने धीरे से कहा।

“हाँ,” जफ़र ने सिर हिलाया,
“उसने दोस्ती से ऊपर सच को रखा। क्योंकि उस पल वह सिर्फ दोस्त नहीं था… वह न्याय था। उसने अपने दिल को छोटा नहीं किया… उसे और बड़ा कर दिया।”

सिद्धार्थ कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—
“तो शायद… असली धर्म न्याय है।”

जफ़र ने उसकी ओर देखा—
“या शायद… असली धर्म इंसानियत है।”

शब्द हवा में ठहर गए—जैसे कोई गहरी सच्चाई अभी जन्मी हो।

“और फिर,” जफ़र ने कहा,
“ईदगाह।”

सिद्धार्थ की आँखों में एक नरमी उतर आई।
“हामिद…”

“हाँ,” जफ़र बोला,
“वह छोटा-सा बच्चा… जो मेले में जाता है। चारों तरफ रंग, खिलौने, मिठाइयाँ… और उसके पास सिर्फ कुछ सिक्के।”

वह थोड़ा झुककर बोला—
“कोई भी बच्चा होता… तो अपने लिए कुछ लेता। लेकिन हामिद… भीड़ के बीच खड़ा होकर अपनी दादी को याद करता है—उनके जले हुए हाथ… चूल्हे की आग… उनकी तकलीफ।”

सिद्धार्थ की आँखें झुक गईं—
जैसे वह उस दर्द को अपने भीतर महसूस कर रहा हो।

“और उसी पल,” जफ़र बोला,
“पूरा मेला बदल जाता है। खिलौने बेकार लगने लगते हैं… मिठाइयाँ फीकी। और वह चिमटा खरीदता है—एक साधारण-सी चीज़… लेकिन उसके पीछे जो भावना है… वह असाधारण है।”

“अपने लिए नहीं…” सिद्धार्थ ने धीमे से कहा।

“किसी और के लिए,” जफ़र ने पूरा किया।

कुछ पल के लिए दोनों चुप रहे। हवा में एक अनकही गर्माहट भर गई थी।

सिद्धार्थ अब आसमान की ओर नहीं देख रहा था।
वह अपने भीतर कुछ खोज रहा था—जैसे उसे एहसास हो रहा हो कि यह चाँद सिर्फ बाहर नहीं… अंदर भी उगता है।

और तभी जफ़र ने धीरे से कहा—
“और एक और कहानी है… जो इस चाँद को और गहराई से समझाती है…”

सिद्धार्थ ने उसकी ओर देखा—
“कौन-सी?”

जफ़र की आँखों में हल्की-सी चमक आई—

***

छत पर हवा अब थोड़ी ठंडी हो गई थी। नीचे से आती आवाज़ें हल्की पड़ने लगी थीं, जैसे रात ने उन्हें अपने भीतर समेटना शुरू कर दिया हो। आसमान अब और गहरा हो चुका था—नीले से काले की ओर बढ़ता हुआ—लेकिन चाँद अब भी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

सिद्धार्थ जफ़र की ओर देख रहा था—उसकी आँखों में अब सिर्फ सवाल नहीं थे, बल्कि एक उत्सुकता थी… जैसे वह अगली कहानी का इंतज़ार कर रहा हो।

“काबुलीवाला…” जफ़र ने धीरे से दोहराया,
“तुम्हें याद है?”

सिद्धार्थ ने हल्का-सा सिर हिलाया—
“थोड़ा-बहुत… एक अफ़ग़ान आदमी… और एक छोटी लड़की… मिनी।”

जफ़र मुस्कुराया—
“हाँ… लेकिन यह कहानी इतनी छोटी नहीं है जितनी हम समझते हैं। यह कहानी दूरी की है… और उस दूरी को पार करने की भी।”

वह दीवार पर टिक गया, जैसे खुद को उस कहानी में डुबो रहा हो।

“सोचो,” उसने कहा,
“एक आदमी… जो अपने देश से बहुत दूर है। उसकी भाषा अलग है, उसका पहनावा अलग है, उसकी दुनिया अलग है। वह यहाँ आता है—रोज़ी-रोटी कमाने के लिए। लेकिन असल में… वह अपने घर से, अपने लोगों से, अपनी बेटी से दूर आ जाता है।”

सिद्धार्थ चुपचाप सुन रहा था।

“उस आदमी के पास यादें होती हैं,” जफ़र बोला,
“अपनी छोटी-सी बेटी की… उसकी हँसी की… उसकी मासूम बातों की। लेकिन वह उन यादों को सिर्फ अपने दिल में रख सकता है—क्योंकि वह उनसे बहुत दूर है।”

हवा में एक हल्की उदासी घुल गई।

“और फिर,” जफ़र ने कहा,
“एक दिन उसकी मुलाकात होती है मिनी से—एक छोटी, चंचल लड़की। वह उससे सवाल पूछती है… बिना डर के, बिना किसी झिझक के। वह नहीं जानती कि वह कौन है… कहाँ से आया है… वह बस उसे एक इंसान की तरह देखती है।”

सिद्धार्थ के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई—
जैसे उसे वह मासूमियत महसूस हो रही हो।

“मिनी की बातें,” जफ़र ने कहा,
“उस आदमी को उसकी अपनी बेटी की याद दिलाती हैं। और धीरे-धीरे… उनके बीच एक रिश्ता बन जाता है। ऐसा रिश्ता जिसमें कोई नाम नहीं है… लेकिन बहुत गहराई है।”

वह थोड़ा रुका—
“वे हँसते हैं, बातें करते हैं… और उन पलों में, वह आदमी अपनी दूरी भूल जाता है। उसे लगता है जैसे वह अपने घर के थोड़ा और करीब आ गया है।”

सिद्धार्थ ने धीरे से कहा—
“सिर्फ हँसी के जरिए…”

“सिर्फ इंसानियत के जरिए,” जफ़र ने मुस्कुराते हुए कहा।

कुछ पल के लिए दोनों चुप रहे। हवा अब और शांत थी—जैसे वह भी उस कहानी को अपने भीतर समेट रही हो।

“लेकिन फिर,” जफ़र की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई,
“जिंदगी हमेशा वैसी नहीं रहती जैसी हम चाहते हैं।”

सिद्धार्थ की आँखों में हल्की-सी चिंता आई।

“एक घटना होती है,” जफ़र बोला,
“और वह आदमी जेल चला जाता है। साल बीत जाते हैं… बहुत साल।”

वह आसमान की ओर देखने लगा—
“जब वह वापस आता है… तो सब कुछ बदल चुका होता है। मिनी अब वह छोटी लड़की नहीं रही। वह बड़ी हो गई है… उसकी दुनिया बदल गई है… और वह उसे पहचान भी नहीं पाती।”

सिद्धार्थ के चेहरे पर एक गहरी उदासी उतर आई।

“सोचो,” जफ़र ने धीरे से कहा,
“जिस रिश्ते को तुमने अपने दिल में इतने सालों तक संभालकर रखा… वह अचानक तुम्हारे सामने खड़ा हो… लेकिन तुम्हें पहचान न पाए।”

हवा में एक खालीपन फैल गया।

“उस पल,” जफ़र ने कहा,
“वह आदमी समझ जाता है… कि समय सिर्फ दूरियाँ नहीं बढ़ाता… वह लोगों को बदल भी देता है।”

सिद्धार्थ ने धीरे से पूछा—
“फिर क्या होता है?”

जफ़र की आवाज़ अब और कोमल हो गई—
“उस दिन… मिनी की शादी होती है। उसके पिता… उस आदमी को देखते हैं… और समझ जाते हैं कि वह क्या महसूस कर रहा है। वे उसे कुछ पैसे देते हैं… ताकि वह अपने देश वापस जा सके… अपनी बेटी के पास।”

सिद्धार्थ की आँखें चमक उठीं—
“तो आखिर में… वह घर लौटता है…”

“हाँ,” जफ़र ने कहा,
“क्योंकि हर इंसान… चाहे वह कहीं भी चला जाए… उसके दिल में एक जगह हमेशा रहती है—जहाँ वह लौटना चाहता है।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

“तो इस कहानी में ईद कहाँ है?” सिद्धार्थ ने धीरे से पूछा।

जफ़र मुस्कुराया—
“यहीं है।”

वह थोड़ा आगे झुका—
“जब मिनी उस आदमी से बिना किसी डर के बात करती है… वह ईद है। जब वह आदमी उसमें अपनी बेटी को देखता है… वह ईद है। जब मिनी के पिता… उसे समझते हैं… और उसकी मदद करते हैं… वह ईद है।”

सिद्धार्थ ध्यान से सुन रहा था।

“ईद सिर्फ एक दिन नहीं है,” जफ़र ने कहा,
“यह एक एहसास है—जब तुम किसी अजनबी में भी अपना देख पाओ। जब तुम दूरी के बावजूद… एक रिश्ता महसूस कर सको।”

हवा अब थोड़ी हल्की लगने लगी थी—जैसे उस कहानी ने कुछ बोझ कम कर दिया हो।

सिद्धार्थ ने आसमान की ओर देखा—
अब भी चाँद नहीं था।

लेकिन उसके भीतर… कुछ बदल चुका था।

“तो… इंसानियत का मतलब सिर्फ अपने लोगों से प्यार करना नहीं है…” उसने धीरे से कहा।

जफ़र ने उसकी ओर देखा—
“बल्कि… हर उस इंसान से जुड़ना है… जो तुम्हारे जैसा महसूस करता है—चाहे वह कहीं से भी हो।”

नीचे से फिर आवाज़ आई—
“अभी तक नहीं दिखा!”

दोनों हल्का-सा मुस्कुरा दिए।

अब उन्हें जल्दी नहीं थी।

क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—
कि चाँद का इंतज़ार सिर्फ आसमान में नहीं…
दिल के भीतर भी होता है।

और कभी-कभी…
वह पहले वहीं उगता है।

***

रात अब पूरी तरह गहराई ले चुकी थी। आसमान एक विशाल, शांत चादर की तरह फैल गया था—गहरा, रहस्यमय, और अपने भीतर अनगिनत कहानियाँ छुपाए हुए। तारे अब साफ दिख रहे थे, जैसे किसी ने अंधेरे के बीच छोटे-छोटे दीप जला दिए हों। नीचे गलियों में हलचल अब भी थी, लेकिन उसमें अब एक अधीरता कम और एक थकान ज़्यादा घुल गई थी—जैसे इंतज़ार लंबा हो गया हो, लेकिन उम्मीद अभी भी जिंदा हो।

छत पर खड़े सिद्धार्थ और जफ़र अब चुप थे। लेकिन यह चुप्पी खाली नहीं थी। यह उन कहानियों से भरी थी जो अभी-अभी उनके बीच से गुज़री थीं—पंच परमेश्वर, ईदगाह, और काबुलीवाला। इन कहानियों ने उनके भीतर कुछ खोल दिया था—कुछ ऐसा, जिसे शब्दों में बाँधना आसान नहीं था।

सिद्धार्थ ने धीरे से आसमान की ओर देखा, फिर जफ़र की ओर—
“अगर इतनी सारी कहानियाँ हमें इंसान बनना सिखाती हैं… तो फिर हम बार-बार वही गलतियाँ क्यों करते हैं?”

जफ़र ने गहरी साँस ली। उसके चेहरे पर अब एक अलग-सी गंभीरता थी—जैसे वह अब सिर्फ कहानियाँ नहीं, सच्चाइयाँ साझा करने वाला हो।

“क्योंकि,” उसने धीरे से कहा,
“हम इतिहास से सीखते नहीं… हम उसे सिर्फ याद रखते हैं।”

हवा अब थोड़ी भारी लगने लगी थी।

“तमस की तरह,” जफ़र ने कहा,
“जहाँ सब कुछ एक छोटी-सी घटना से शुरू होता है। एक अफवाह… एक डर… और फिर वह डर लोगों के बीच दीवार बन जाता है।”

सिद्धार्थ ने ध्यान से सुना।

“जब डर आता है,” जफ़र बोला,
“तो हम सोचने लगते हैं कि सामने वाला हमारा दुश्मन है। हम यह भूल जाते हैं कि कल तक वही इंसान हमारा पड़ोसी था… हमारा दोस्त था।”

हवा में एक ठंडी लहर-सी दौड़ गई।

“और फिर,” उसने कहा,
“वही डर नफरत में बदल जाता है… और नफरत बहुत जल्दी आग बन जाती है।”

सिद्धार्थ की आवाज़ धीमी थी—
“और फिर सब कुछ जलने लगता है…”

“हाँ,” जफ़र ने सिर हिलाया,
“घर… रिश्ते… भरोसा… सब कुछ। और सबसे दुख की बात—कोई नहीं जीतता।”

कुछ पल दोनों चुप रहे। उस चुप्पी में जैसे अनगिनत अधूरी कहानियाँ थीं—जो कभी पूरी नहीं हो सकीं।

“ट्रेन टू पाकिस्तान में भी यही हुआ,” जफ़र ने आगे कहा,
“एक ऐसा गाँव… जहाँ लोग साथ रहते थे, एक-दूसरे के त्योहार मनाते थे… जहाँ पहचान थी, लेकिन वह इंसानियत से बड़ी नहीं थी।”

वह थोड़ा रुका—
“लेकिन फिर बंटवारा आया… और सब कुछ बदल गया।”

सिद्धार्थ की आँखें गहरी हो गईं।

“अचानक,” जफ़र बोला,
“लोग इंसान से नाम बन गए… धर्म बन गए… पहचान बन गए। और जब ऐसा होता है… तो इंसानियत पीछे छूट जाती है।”

हवा अब बिल्कुल शांत थी—जैसे वह भी इस सच को महसूस कर रही हो।

“लेकिन,” जफ़र ने धीरे से कहा,
“हर अंधेरे में कुछ लोग ऐसे होते हैं… जो रोशनी चुनते हैं।”

सिद्धार्थ ने उसकी ओर देखा।

“वहाँ भी,” जफ़र बोला,
“एक आदमी था… जिसने अपनी जान जोखिम में डाल दी… सिर्फ इसलिए कि कुछ और लोग बच जाएँ। उसने यह नहीं देखा कि वे कौन हैं… उसने सिर्फ यह देखा कि वे इंसान हैं।”

सिद्धार्थ की आवाज़ में हल्की-सी आशा थी—
“तो… रोशनी हमेशा रहती है?”

“हाँ,” जफ़र ने कहा,
“लेकिन उसे कोई चुनता है।”

कुछ देर बाद, सिद्धार्थ ने पूछा—
“और आज?”

जफ़र ने आसमान की ओर देखा—
“आज भी चुनौतियाँ हैं। कभी-कभी लोग एक-दूसरे को नाम से पहचानते हैं… इंसान के रूप में नहीं। एक नाम सुनते ही एक धारणा बन जाती है। दूरी बनती है… और उस दूरी में डर पनपता है।”

सिद्धार्थ ने धीरे से सिर हिलाया।

“लेकिन,” जफ़र की आवाज़ अब थोड़ी उजली हो गई,
“कहानी यहीं खत्म नहीं होती।”

वह थोड़ा सीधा खड़ा हुआ—
“सोचो… एक बच्चा, जो समुद्र किनारे एक छोटे-से शहर में बड़ा होता है… और फिर पूरे देश का राष्ट्रपति बनता है। उसका नाम सिर्फ एक पहचान नहीं है—वह एक संभावना है, जो हर बच्चे में छिपी है।”

सिद्धार्थ की आँखों में चमक आ गई।

“फिर सोचो,” जफ़र ने कहा,
“एक लड़की… जो दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर खड़ी होती है… और हर बार अपने देश का नाम गर्व से लेती है। वह सिर्फ खेल नहीं खेल रही होती… वह एक संदेश दे रही होती है—कि सीमाएँ सिर्फ नक्शों पर होती हैं, सपनों में नहीं।”

हवा अब हल्की लगने लगी थी।

“और फिर,” जफ़र ने कहा,
“संगीत… जब तबले की थाप दिल तक पहुँचती है… तो वह यह नहीं पूछती कि तुम कौन हो। वह बस तुम्हें छू लेती है।”

सिद्धार्थ मुस्कुरा दिया—
जैसे उसे एहसास हो रहा हो कि इंसानियत कितने रूपों में सामने आती है।

“और एक कहानी,” जफ़र ने धीरे से कहा—
“अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान की।”

सिद्धार्थ का चेहरा गंभीर हो गया।

“वह एक क्रांतिकारी थे,” जफ़र बोला,
“और उनके सबसे करीबी दोस्त थे राम प्रसाद बिस्मिल। दोनों अलग धर्मों से थे… लेकिन उनका सपना एक था—आज़ादी।”

वह थोड़ा रुका—
“उन्होंने साथ लड़ाई लड़ी… साथ सपने देखे… और साथ मरने के लिए भी तैयार थे।”

हवा में एक गहरी गंभीरता उतर आई।

“जब अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान पकड़े गए,” जफ़र ने कहा,
“उन्हें एक मौका दिया गया—अगर वे अपने दोस्तों का नाम बता दें… तो उनकी जान बच सकती है।”

सिद्धार्थ की साँस रुक गई।

“लेकिन उन्होंने मना कर दिया।”

कुछ पल के लिए सब कुछ थम-सा गया।

“उन्होंने दोस्ती चुनी… डर नहीं। उन्होंने इंसानियत को चुना… अपने जीवन से भी ऊपर।”

उसी पल नीचे से एक तेज़ आवाज़ आई—
“चाँद दिख गया!”

दोनों ने एक साथ आसमान की ओर देखा।

और वहाँ था—
एक पतला-सा, चमकता हुआ चाँद… जैसे अंधेरे के बीच किसी ने उम्मीद की एक रेखा खींच दी हो।

वह छोटा था… लेकिन उसकी रोशनी गहरी थी।

कुछ पल के लिए दोनों कुछ नहीं बोले।

फिर सिद्धार्थ ने धीरे से कहा—
“ये चाँद… किसी एक का नहीं है।”

जफ़र ने उसकी ओर देखा—
“जैसे इंसानियत।”

सिद्धार्थ ने अपना हाथ बढ़ाया—
“ईद मुबारक, जफ़र।”

जफ़र ने उसका हाथ मजबूती से थाम लिया—
“ईद मुबारक, सिद्धार्थ।”

नीचे जश्न अपने पूरे रंग में था—लोग गले मिल रहे थे, हँस रहे थे, बच्चे उछल रहे थे…

लेकिन उस छत पर… एक और जश्न हुआ था।

वहाँ दो दोस्तों ने सिर्फ चाँद नहीं देखा था—
उन्होंने उसे समझा था।

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