वह तितली की तरह उड़ती है—
सुबह की रोशनी से बनी।
उसके नीले, सुनहरे, पंख
कभी-कभी अचानक सोने जैसे चमकते हैं,
आनंद के छोटे झंडे जैसे
आकाश में झिलमिलाते हुए।
वह हवा में डुबकी लगाती है,
घूमती है, रुकती है—
एक कांपते हुए पैर से
फूल को छूकर परखती है,
पीछे हटती है, फिर घूमती है,
जैसे तय कर रही हो
कि उसे रहना है या छोड़ना।
हर बार जब वह पंखुड़ी से उठती है,
वह हवा की हल्की फुसफुसाहट सुनती है—
जैसे कोई हँसी,
जैसे दुनिया खुश हो
कि वह उसके बीच से गुजर रही है।
वह धीरे-धीरे पंख खोलती और मोड़ती है,
एक पल के लिए रुकती है,
फिर उड़ पड़ती है।
फूल से फूल तक जाती है,
जैसे कोई विचार
जो कहीं टिकना नहीं चाहता।
फूल उससे खुशबू में बात करते हैं—
चमेली, जंगली हिबिस्कस,
कभी दर्द भरी, कभी मीठी।
वह रंगों का स्वाद लेती है,
पैर मुश्किल से जमीन को छूते हैं।
पराग उसके टखनों पर गिरता है,
पंखुड़ियाँ हाथों की तरह उसे छूती हैं।
वह थोड़ी देर और रुकती है,
फिर चली जाती है
इससे पहले कि सुंदरता भारी हो जाए।
हवा उसके पंखों को छूती है,
कभी उठाती है, कभी बहा ले जाती है;
वह विरोध नहीं करती—
संयोग उसके भीतर हल्का-सा कंपन है।
वह झूलती है,
खुद को संभालती है,
फिर छोड़ देती है।
अदृश्य हवाओं पर भरोसा करती है
कि वे नाजुक चीज़ों को
संभाल लेंगी।
वह समय नहीं ढोती।
वह मान लेती है
कि हर क्षण काफी है।
लेकिन कभी-कभी,
जब शाम गाढ़ी हो जाती है,
जब पंख थक जाते हैं
और उजाला बोझ लगने लगता है,
वह स्थिरता चाहती है—
कुछ ऐसा
जो छूने पर गायब न हो।
वह धीरे-धीरे नीचे उतरती है,
एक पत्ते से देर तक चिपकी रहती है,
पंख खोलने के बजाय
उन्हें मोड़ लेती है।
तब वह वृक्ष बन जाती है।
वह खड़ी रहती है।
दुनिया अब अलग सुनाई देती है—
पत्तों की सरसराहट,
छाया की धीमी साँस,
दूर से आती लकड़ी की हल्की ठक-ठक।
वह बिना हिले सुनना सीखती है,
हवा को धैर्य से जवाब देती है,
पक्षियों को
अपनी बात पूरी करने देती है।
उसकी जड़ें मिट्टी की भाषा सीखती हैं—
गीली, अंधेरी, सच्ची।
वह बारिश की खुशबू
गिरने से पहले महसूस करती है,
जैसे कोई पुरानी याद
ज़मीन के भीतर से उठती हो।
जड़ें फैलती हैं, मुड़ती हैं, थामती हैं,
पत्थर और पुरानी हड्डियों के पास से
रास्ता बनाती हैं,
तेज़ी नहीं, गहराई चुनती हैं।
छाल खुरदरी हो जाती है,
सूरज में गर्म, रात में ठंडी।
जहाँ तूफ़ानों ने झुकने को कहा,
वहाँ निशान रह जाते हैं।
वह फिर भी टिकी रहती है।
वह बिना शिकायत पत्तियाँ गिराती है,
उन्हें छोटे बलिदानों की तरह गिरने देती है
ताकि नीचे जीवन फल सके।
नंगे मौसमों का इंतज़ार करती है,
समय को अपनी परतों में गुजरने देती है।
पक्षी उसका वजन आज़माते हैं,
बच्चे उसकी चुप्पी में झुकते हैं,
थकी हुई पीठें
बिना पूछे आराम पा जाती हैं।
वह सबको थामे रहती है—
हँसी, शोर, भूल।
और धन्यवाद नहीं माँगती।
उसकी शांति के भीतर,
कभी-कभी पंखों की याद उठती है—
हल्केपन की,
रंगों की हँसी जैसी।
वह याद को स्वीकार करती है,
पर उससे बँधती नहीं।
और उस पुराने स्मरण के भीतर,
रस धीरे-धीरे ऊपर उठता है।
धीरे-धीरे।
भरोसे के साथ।
अब वह समझती है—
स्वतंत्रता केवल उड़ान नहीं,
सेवा ही सुंदरता का अंत नहीं।
कुछ दिन वह आकाश है,
कुछ दिन धरती।
और कुछ दिन—शांत, पूर्ण—
एक ऐसी हृदय है
जहाँ एक तितली
वृक्ष पर विश्राम करती
और घर जैसा महसूस करती है।



