दो प्रतिशत की रोशनी

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कानून से करुणा तक, और करुणा से क्षमता तक की कहानी

गाँव के बाहर पीपल का एक पुराना पेड़ था। उसकी छाँव में चौपाल सजती थी, और वहीं जीवन की छोटी-बड़ी बातें तय होती थीं। उसी चौपाल पर एक दिन रेडियो से खबर आई कि अब बड़ी कंपनियाँ अपने औसत लाभ का दो प्रतिशत समाज के लिए खर्च करेंगी। लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। दो प्रतिशत — सुनने में छोटा, पर शायद अर्थ में बड़ा।

रामखेलावन ने पूछा—
“मास्टरजी, यह दो प्रतिशत आखिर कितना होता है?”

मास्टरजी घर गए, अलमारी से कंपनी अधिनियम की प्रति लेकर लौटे।

उन्होंने कहा—
“यदि किसी कंपनी की नेट वर्थ 500 करोड़ से अधिक हो, या टर्नओवर 1000 करोड़ से ऊपर, या शुद्ध लाभ 5 करोड़ से ज्यादा, तो उसे पिछले तीन वर्षों के औसत लाभ का कम से कम 2% CSR पर खर्च करना होगा। यह 2013 का कानून है—धारा 135।”

गाँव में जैसे कोई अदृश्य गणित बैठ गया। दो प्रतिशत, पर करोड़ों में।

मास्टरजी ने वहीं पहली पुस्तक खोली—Corporate Social Responsibility: Readings and Cases in a Global Context।

उन्होंने पढ़कर सुनाया—
“व्यवसाय केवल लाभ का यंत्र नहीं, बल्कि समाज के विश्वास का संवाहक है। 2008 के संकट के बाद दुनिया में कंपनियों पर भरोसा 60 प्रतिशत से नीचे गिर गया था। इसलिए आज 95 प्रतिशत से अधिक बड़ी कंपनियाँ अपनी सामाजिक और पर्यावरणीय रिपोर्ट प्रकाशित करती हैं।”

लोग समझने लगे कि यह कानून केवल खर्च का नियम नहीं, विश्वास की पुनर्स्थापना है।

कुछ सप्ताह बाद विद्यालय में, बच्चों के बीच खड़े होकर मास्टरजी ने दूसरी पुस्तक खोली—The Palgrave Handbook of Corporate Social Responsibility।

उन्होंने कहा—
“CSR का विकास चार चरणों में हुआ—परोपकार, अनुपालन, रणनीतिक जुड़ाव और सतत विकास। आज वैश्विक ESG निवेश 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। भारत में लगभग 70 प्रतिशत CSR शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में जाता है।”

छोटू ने पूछा—
“क्या हमारे गाँव में भी कुछ बदल सकता है?”

मास्टरजी ने उत्तर दिया—
“बदलाव वहीं आता है जहाँ नीति और नीयत मिलते हैं।”

इसी समय शहर की एक बड़ी कंपनी ने 48 करोड़ रुपये का CSR बजट घोषित किया। उसके प्रमुख थे—अरविंद महिंद्रा। उन्होंने गाँव में कुछ परियोजनाएँ शुरू कीं—कंबल वितरण, एक छोटा स्वास्थ्य शिविर, कुछ छात्रवृत्तियाँ। सबने सराहना की, पर बदलाव गहरा नहीं था।

एक शाम अरविंद महिंद्रा स्वयं गाँव आए। चौपाल पर मास्टरजी के साथ बैठे।

अरविंद ने कहा—
“हमने 12 करोड़ रुपये खर्च किए, पर असर सीमित है। लोग आभारी हैं, पर परिवर्तन स्थायी नहीं दिखता।”

मास्टरजी कुछ देर मौन रहे। फिर उन्होंने वही पहली पुस्तक फिर से खोली।

“रणनीतिक CSR,” उन्होंने पढ़ा,
“वहीं सफल होता है जहाँ कंपनी की विशेषज्ञता और सामाजिक आवश्यकता का संगम हो।”

उन्होंने अरविंद की ओर देखकर कहा—

“आपकी कंपनी इंजीनियरिंग, मशीनरी और तकनीक में दक्ष है।
आपके पास प्रशिक्षण संस्थान हैं।
आपके पास आपूर्ति शृंखला है।
आपके पास प्रबंधन क्षमता है।

फिर आप केवल कंबल क्यों बाँट रहे हैं?”

अरविंद चुप रहे।

मास्टरजी ने आगे कहा—

“यदि आईटी कंपनी डिजिटल शिक्षा करे, यदि ऑटो कंपनी तकनीकी कौशल दे, यदि ऊर्जा कंपनी सौर समाधान लगाए—तो यह दान नहीं, दक्षता का विस्तार होता है।
CSR को आपकी विशेषज्ञता से जोड़िए।”

चाय की टपरी पर बैठे रामखेलावन ने पूछा—
“तो मतलब कंपनी वही करे जो उसे सबसे अच्छा आता है?”

मास्टरजी मुस्कराए—
“हाँ, पर समाज के लिए।”

उस दिन से रणनीति बदल गई। 12 करोड़ रुपये डिजिटल और तकनीकी कौशल केंद्र के लिए लगाए गए। पाँच वर्षों में 3200 युवाओं को प्रशिक्षण मिला। उनमें से 58 प्रतिशत को तकनीकी क्षेत्र में रोजगार मिला। छोटू की आय 6000 से बढ़कर 9000 रुपये हुई—करीब 50 प्रतिशत वृद्धि।

स्वास्थ्य शिविरों को कंपनी की आपूर्ति शृंखला से जोड़ा गया। दवाएँ समय पर आने लगीं। 18 ग्राम सभाएँ हुईं। 420 ग्रामीणों ने भाग लिया। टीकाकरण दर 55 प्रतिशत से बढ़कर 78 प्रतिशत हो गई।

मास्टरजी ने तीसरी पुस्तक खोली—Corporate Social Responsibility in India: Cases and Developments After the Legal Mandate।

उन्होंने बताया—
“भारत में पिछले एक दशक में CSR व्यय एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। केवल 2022-23 में लगभग 25,000 करोड़ रुपये खर्च हुए। और अब 1 करोड़ से बड़ी परियोजनाओं का प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्य है।”

अरविंद ने महसूस किया कि अब उनका CSR केवल अनुपालन नहीं, रणनीति बन चुका है।

बरामदे में दीपक के पास एक रात मास्टरजी ने चौथी पुस्तक खोली—Managing Corporate Social Responsibility: A Communication Approach।

उन्होंने कहा—
“संवाद के बिना CSR अधूरा है। यदि समुदाय साथ न हो, तो लागत 20–30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।”

अरविंद ने हर परियोजना से पहले सामुदायिक परामर्श अनिवार्य कर दिया।

फिर अंतिम पुस्तक खुली—The Blu Ribbon Revolution।

“जब कौशल, बाजार और वित्त जुड़ते हैं,” मास्टरजी ने पढ़ा,
“तो सामाजिक उद्यमों की आय दोहरे अंकों में बढ़ती है।”

कंपनी ने 5 करोड़ रुपये का उद्यम कोष बनाया। तीन वर्षों में 240 छोटे उद्यम खड़े हुए। 62 प्रतिशत महिलाओं द्वारा संचालित। औसत आय 8500 से बढ़कर 14,000 रुपये।

देश में CSR व्यय बढ़ता रहा। पर्यावरण पर खर्च 10 से 18 प्रतिशत तक पहुँचा। भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य घोषित किया।

एक दिन फिर वही पीपल, वही चौपाल।

रामखेलावन ने पूछा—
“अब बताइए, दो प्रतिशत कितना होता है?”

मास्टरजी ने इस बार अरविंद महिंद्रा की ओर देखा, मानो उत्तर उन्हें ही देना हो।

अरविंद उठे। उनकी आवाज़ में अब वह औपचारिकता नहीं थी जो पहली बार गाँव आने पर थी।

उन्होंने कहा—

“दो प्रतिशत वह नहीं जो बैलेंस शीट में दिखता है।
वह वह है जो तब दिखता है जब हमारी फैक्ट्री की मशीनों का ज्ञान गाँव के बच्चों के हाथों में कौशल बन जाए।
जब हमारी इंजीनियरिंग की समझ सौर पंप बनकर खेतों में पानी पहुँचा दे।
जब हमारी प्रबंधन क्षमता महिलाओं के उद्यम को लाभ में बदल दे।

पहले हम दान दे रहे थे।
फिर हमें समझ आया—हमें अपना अनुभव देना है।”

कुछ क्षण मौन रहा।

मास्टरजी ने धीरे से कहा—

“कानून ने आपको दो प्रतिशत खर्च करने को कहा था।
पर आपने जब अपनी विशेषज्ञता जोड़ दी, तब वह दो प्रतिशत सौ प्रतिशत प्रभाव बन गया।”

अरविंद ने सिर झुका लिया।

“आज हमारे 48 करोड़ के बजट से 3200 युवा प्रशिक्षित हुए, 240 उद्यम खड़े हुए, 62 प्रतिशत महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुईं।
पर असली लाभ यह है कि अब यह गाँव किसी पर निर्भर नहीं है।”

पीपल के पत्ते हवा में हिले। दूर डिजिटल केंद्र की रोशनी जल उठी। खेतों में सौर पंप की हल्की ध्वनि सुनाई दी। बच्चे स्कूल की पक्की दीवारों के पास खेल रहे थे।पीपल के पत्ते फिर सरसराए, जैसे समय स्वयं कह रहा हो—कानून ने राह बनाई, विचारों ने दिशा दी, पर परिवर्तन तब हुआ जब मनुष्य ने मनुष्य का हाथ थामा।

मास्टरजी ने अंतिम बार कहा—

“CSR तब पूर्ण होता है,
जब कंपनी समाज को वह देती है
जो वह स्वयं सबसे अच्छी तरह जानती है।
और समाज उसे लौटाता है—विश्वास।”

उस क्षण सबने समझ लिया—

दो प्रतिशत कोई संख्या नहीं थी।
वह एक सेतु था—व्यापार और विश्वास के बीच।
और जब वह सेतु मजबूती से बन जाता है,
तो दोनों किनारे समृद्ध हो जाते हैं।

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